यह पठार ब्रिटिश भारतीय भूभाग नहीं था, इसलिए यहाँ आंदोलन करने के लिए कोई औपनिवेशिक प्रशासन नहीं था और मद्रास प्रेसिडेंसी की कांग्रेस-मशीनरी भी नहीं। इसकी जगह जो संगठित हुआ वह नागरिक और सांस्कृतिक था, और वह अपनी ही तारीख़ों पर चला। एक वाचनालय आंदोलन 1901 में हैदराबाद के श्री कृष्णदेवराय आंध्र भाषा निलयम से शुरू हुआ और पुस्तकालयों, प्रेसों तथा प्रौढ़ कक्षाओं के रूप में तेलुगु ज़िलों भर में फैला। 1921 का आंध्र जन संघम 1930 में आंध्र महासभा बन गया, जिसने तेलुगु-भाषी ज़िलों को एक स्थायी वार्षिक मंच दिया और जिसके शुरुआती प्रस्ताव बाल-विवाह, विधवा-विवाह और स्कूली शिक्षा पर थे। हैदराबाद के उपनगरों से चलाया गया एक समांतर अभियान अस्पृश्यता और जोगिनी-समर्पण के ख़िलाफ़ काम करता रहा। गोदावरी के जंगल में शिकायत राजनीति नहीं, ज़मीन और वन-क़ानून थी, और उसी से इस पठार के दो प्रलेखित विद्रोह निकले। हैदराबाद में जन्मे कई लोग राष्ट्रीय आंदोलन में प्रमुख रहे, पर वे राज्य के बाहर प्रमुख थे। यह प्रविष्टि 1947 पर रुक जाती है।
गोदावरी के जंगल में रामजी गोंड का प्रतिरोधलगभग 1857–1860
निर्मल, उतनूर, चेन्नूर और आसिफ़ाबाद के इलाकों के एक गोंड सरदार ने 1857 की उथल-पुथल के दौरान और उसके बाद उत्तरी जंगल में बाहरी राजस्व तथा वन-सत्ता के विस्तार का प्रतिरोध किया।
परिणाम: उन्हें पकड़कर 9 अप्रैल 1860 को फाँसी दे दी गई। निर्मल के पास एक बरगद के पेड़ पर सामूहिक फाँसी की बात स्थानीय परंपरा में इसी दमन से जोड़ी जाती है; अभिलेख से यह प्रमाणित नहीं है।
पुस्तकालय और वाचनालय आंदोलन (ग्रंथालयोद्यमम)1901 से
1901 में हैदराबाद के श्री कृष्णदेवराय आंध्र भाषा निलयम से शुरू होकर ज़िलों भर में तेलुगु वाचनालय, पुस्तक-उधार पुस्तकालय और छोटे प्रेस खोले गए, जो अक्सर प्रौढ़ साक्षरता कक्षाओं और तेलुगु पाठ्यपुस्तकों तथा संदर्भ-ग्रंथों की छपाई से जुड़े होते थे।
परिणाम: ये पुस्तकालय वह भौतिक जाल बन गए जिस पर बाद के भाषा और समाज-सुधार संगठन खड़े हुए; महासभा के कई ज़िला-अधिवेशन इन्हीं से आयोजित हुए।
आंध्र जन संघम और आंध्र महासभा1921–1946
एक समाज-सुधार सम्मेलन में तेलुगु में रखे गए प्रस्ताव को सुनने से इनकार किए जाने के बाद नवंबर 1921 में हैदराबाद में बना आंध्र जन संघम आगे चलकर आंध्र महासभा बना, जिसका पहला अधिवेशन 1930 में जोगीपेट में सुरवरम प्रतापरेड्डी की अध्यक्षता में हुआ और जिसमें बाल-विवाह तथा विधवा-विवाह पर प्रस्ताव पारित हुए। बाद के अधिवेशनों ने मातृभाषा में शिक्षा, काश्तकारी और वेट्टी — यानी गाँववालों से स्थानीय अधिकारियों को देनी पड़ने वाली बेगार — के सवाल उठाए।
परिणाम: 1946 से पहले तेरह अधिवेशन हुए, और महासभा ने राज्य के तेलुगु-भाषी ज़िलों को उनका पहला स्थायी सार्वजनिक मंच दिया।
आदिलाबाद वन आंदोलन1928–1940
आसिफ़ाबाद और जोडेघाट के इलाकों के गोंड किसानों ने कुमरम भीम के नेतृत्व में अपनी पोडु सफ़ाइयों को मान्यता देने और वन अधिकारियों तथा जागीरदारों द्वारा बेदख़ली के ख़िलाफ़ दबाव बनाया। यह अभियान एक दशक से ज़्यादा समय तक रुक-रुककर चलने वाले वन आंदोलन के रूप में चला।
परिणाम: 1940 में आसिफ़ाबाद के तालुक़दार के अधीन सशस्त्र पुलिस से हुई मुठभेड़ में भीम और पंद्रह अन्य मारे गए; इसकी तारीख़ कहीं अप्रैल और कहीं अक्टूबर बताई जाती है। इसके बाद राज्य ने जंगल की स्थितियों की जाँच के लिए मानवशास्त्री क्रिस्टोफ़ फ़ॉन फ़्यूरर-हाइमेनडॉर्फ़ को नियुक्त किया, और 1946 में हैदराबाद आदिवासी क्षेत्र विनियम लागू किया गया।