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पंजाब के दोआब · Upper Indus–Gangetic Plain

स्वतंत्रता सेनानी

स्वाधीनता संघर्ष में पंजाब का हिस्सा तीन ख़ास तरीक़ों से असामान्य है। पहला, 1857 में वह बड़ी हद तक शांत रहा — प्रांत को अपने में मिलाए हुए केवल आठ साल हुए थे, और उसकी पलटनें दिल्ली के साथ जुड़ने के बजाय उसके ख़िलाफ़ इस्तेमाल की गईं — इसलिए इस क्षेत्र का उन्नीसवीं सदी का प्रतिरोध उस तारीख़ से पहले और बाद में बैठता है: 1848–49 का भाई महाराज सिंह का उभार, और कूका आंदोलन, जो धार्मिक सुधार के रूप में शुरू हुआ और भारत में कहीं भी ब्रिटिश अदालतों, स्कूलों, माल और डाक के सबसे पुराने संगठित बहिष्कारों में से एक बन गया। दूसरा, बीसवीं सदी की क्रांतिकारी राजनीति यहाँ संगठित होने से पहले विदेश में संगठित हुई: ग़दर पार्टी उत्तर अमेरिका के प्रशांत तट पर प्रवासियों ने बनाई, और वह 1914 में घर लौटी। तीसरा, इस क्षेत्र में 1920 के दशक का सबसे बड़ा जन आंदोलन कांग्रेस का अभियान नहीं, गुरुद्वारों के नियंत्रण के लिए चला अकाली अभियान था, जो अनुशासित था, जान-बूझकर अहिंसक था, और एक क़ानून पर जाकर ख़त्म हुआ। चारों दोआबों में सबसे छोटे दोआबा ने इस सबका एक ऐसा हिस्सा दिया जो उसके आकार से बिलकुल बेमेल है, क्योंकि लोग इसी दोआब से प्रवास करते थे।

विद्रोह और आंदोलन

1848–49 का उभार1848–1849

दूसरे आंग्ल-सिख युद्ध के दौरान और उसके बाद भाई महाराज सिंह ने गाँव और संगत के जालों के ज़रिए दोआबों भर में प्रतिरोध संगठित किया, और लाहौर राज्य की मैदानी सेनाओं के हार जाने के बाद भी अभियान चलाए रखने की कोशिश की।

परिणाम: दिसंबर 1849 में पकड़े गए और सिंगापुर भेज दिए गए, जहाँ 1856 में उनका देहांत हुआ। पंजाब को 29 मार्च 1849 को अपने में मिला लिया गया।

कूका या नामधारी आंदोलन1857–1872

मालवा के इलाक़े में भैणी साहिब के राम सिंह के नेतृत्व में चला एक सुधार आंदोलन, जो राजनीतिक असहयोग में बदल गया — ब्रिटिश अदालतों, स्कूलों, कारख़ाने के माल और डाक सेवा का बहिष्कार, जिसके साथ अपने ही ज़िलों का एक समानांतर आंतरिक प्रशासन भी चला। जनवरी 1872 में कूकाओं के एक दल ने गोवध के मामले पर मालेरकोटला पर हमला किया।

परिणाम: 17 और 18 जनवरी 1872 को मालेरकोटला में छियासठ कूकाओं को स्थानीय डिप्टी कमिश्नर के आदेश पर, बिना मुक़दमे के, तोप से उड़ाकर मार दिया गया। राम सिंह को रंगून भेज दिया गया और 1885 में वहीं उनका देहांत हुआ।

ग़दर आंदोलन1913–1915

1913 में सैन फ़्रांसिस्को में पंजाबी प्रवासी मज़दूरों और छात्रों ने बनाई, ग़दर पार्टी ने गुरुमुखी और उर्दू में एक अख़बार निकाला और 1914 में युद्ध छिड़ने पर अपने कई हज़ार सदस्यों को एक आम विद्रोह की कोशिश के लिए भारत वापस भेजा। कोमागाटा मारू, जिसे सरहाली के गुरदित सिंह ने कनाडा के बहिष्करण क़ानूनों को परखने के लिए किराए पर लिया था, इसी दौर में लौटा और सितंबर 1914 में बजबज पर उस पर गोली चली।

परिणाम: 21 फ़रवरी 1915 के लिए तय विद्रोह की दो दिन पहले एक मुख़बिर ने ख़बर कर दी। उसके बाद लाहौर षड्यंत्र के मुक़दमे चले; अभियुक्तों में से कई को नवंबर 1915 में फाँसी दी गई और कहीं ज़्यादा को काले पानी भेजा गया।

अकाली गुरुद्वारा आंदोलन और बब्बर अकाली प्रतिक्रिया1920–1926

ऐतिहासिक गुरुद्वारों का नियंत्रण वंशानुगत महंतों से निर्वाचित समितियों को सौंपने का अभियान, जो एक के बाद एक जत्थों ने लड़ा, जिन्होंने बिना पलटवार किए गिरफ़्तारी और मार सही — 1921 में इस क्षेत्र के पश्चिम में ननकाना साहिब पर, 1922 में गुरु का बाग़ पर और 1924 में जैतो पर। जिस हिस्से ने अहिंसक तरीक़े को नकारा वह 1921 में बब्बर अकालियों के रूप में अलग हो गया और दोआबा के ज़िलों में सक्रिय रहा।

परिणाम: 1925 के सिख गुरुद्वारा अधिनियम ने इन स्थानों का निर्वाचित प्रबंधन स्थापित किया — उस दौर के उन गिने-चुने जन अभियानों में से एक जो उसी क़ानून पर जाकर ख़त्म हुआ जिसकी उसने माँग की थी। बब्बर अकाली आंदोलन को 1923 में ग़ैर-क़ानूनी घोषित कर दिया गया और उसके बाद चले षड्यंत्र के मुक़दमों ने उसे तोड़ दिया, जिनमें पाँच लोगों को मौत की सज़ा हुई और कहीं ज़्यादा को काले पानी भेजा गया।

व्यक्ति

नामवर्षआंदोलनकिसलिए मशहूर
भाई महाराज सिंहनौरंगाबाद, अमृतसर ज़िला निधन 1856 1848–49 का उभार दूसरे आंग्ल-सिख युद्ध के दौरान और उसके बाद दोआबों भर में सशस्त्र प्रतिरोध संगठित किया।1849 में पकड़े गए और सिंगापुर भेज दिए गए; 1856 में वहीं क़ैद में उनका देहांत हुआ।
राम सिंहभैणी साहिब, लुधियाना 1816–1885 कूका या नामधारी आंदोलन एक सुधार आंदोलन का नेतृत्व किया जो 1860 के दशक से मालवा के इलाक़े में ब्रिटिश अदालतों, स्कूलों, माल और डाक के एक संगठित बहिष्कार में बदल गया।1872 में रंगून भेज दिए गए और 1885 में वहीं उनका देहांत हुआ।
अजीत सिंहखटकड़ कलाँ, जालंधर 1881–1947 1907 का कृषि-आंदोलन 1907 में भूमि-उपनिवेशन विधेयक और नहरी जल-दरों के ख़िलाफ़ चले उस अभियान के संगठनकर्ताओं में, जिसके साथ "पगड़ी सँभाल जट्टा" गीत जुड़ा था। वे भगत सिंह के चाचा थे।1907 में मांडले भेज दिए गए और उसके बाद के चार दशकों का ज़्यादातर हिस्सा निर्वासन में बिताया; 1947 में उनका देहांत हुआ।
सोहन सिंह भकनाभकना, अमृतसर ज़िला 1870–1968 ग़दर अमेरिका के प्रशांत तट पर मिल में काम करने वाले प्रवासी मज़दूर और 1913 में ग़दर पार्टी के संस्थापक अध्यक्ष।पहले लाहौर षड्यंत्र मुक़दमे में मौत की सज़ा हुई; सज़ा घटाकर आजीवन निर्वासन कर दी गई और सोलह साल बाद 1930 में वे रिहा हुए।
करतार सिंह सराभासराभा, लुधियाना 1896–1915 ग़दर ग़दर अख़बार का गुरुमुखी संस्करण चलाने के लिए कैलिफ़ोर्निया में अपनी पढ़ाई छोड़ी, 1914 में भारत लौटे और फ़रवरी 1915 के लिए तय विद्रोह के प्रमुख संगठनकर्ताओं में रहे। मुक़दमे में उन्होंने ज़िम्मेदारी अपने ऊपर ली।नवंबर 1915 में उन्नीस साल की उम्र में लाहौर सेंट्रल जेल में फाँसी दी गई।
किशन सिंह गड़गजबंगा, जालंधर निधन 1926 बब्बर अकाली अहिंसा के सवाल पर यह समूह मुख्य अकाली अभियान से अलग होने के बाद 1921 से दोआबा के ज़िलों में बब्बर अकाली आंदोलन के प्रमुख संगठनकर्ता।बब्बर अकाली षड्यंत्र मुक़दमे में दोषी ठहराए गए और 1926 में लाहौर में उन्हें प्राणदंड दिया गया।
लाला लाजपत रायढुडीके, मोगा 1865–1928 कांग्रेस; स्वदेशी; साइमन कमीशन का बहिष्कार कांग्रेस नेता, लेखक और प्रांत में स्कूलों तथा बैंकों के संस्थापक; 1907 में कृषि-आंदोलन के साथ-साथ बिना मुक़दमे के मांडले भेजे गए, और उसके बाद दो दशकों तक प्रांत की राजनीति के केंद्रीय चेहरे रहे।लाहौर में साइमन कमीशन के प्रदर्शन पर हुए लाठीचार्ज में घायल होने के कुछ हफ़्तों बाद 17 नवंबर 1928 को उनका देहांत हुआ।
भगत सिंहखटकड़ कलाँ, जालंधर 1907–1931 नौजवान भारत सभा; हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन संगठनकर्ता और लेखक, 1926 में नौजवान भारत सभा के संस्थापक, और उस दौर के आंदोलन का सबसे ज़्यादा पढ़ा जाने वाला राजनीतिक लेखन लिखने वाले। दूसरे लाहौर षड्यंत्र मुक़दमे में उन पर मुक़दमा चला।23 मार्च 1931 को लुधियाना के सुखदेव थापर और शिवराम राजगुरु के साथ लाहौर सेंट्रल जेल में फाँसी दी गई।
ऊधम सिंहसुनाम, मालवा के इलाक़े में 1899–1940 ग़दर से जुड़ाव; 1940 में अकेले काम किया जलियाँवाला बाग़ की गोलीबारी के इक्कीस साल बाद, 13 मार्च 1940 को लंदन के कैक्सटन हॉल में 1919 के पंजाब के उपराज्यपाल माइकल ओ'डायर को गोली मारी।लंदन में मुक़दमा चला और 31 जुलाई 1940 को पेंटनविल जेल में फाँसी दी गई।

पंजाब के दोआब के वे लोग जिन्होंने औपनिवेशिक शासन का प्रतिरोध किया, और वे क्षेत्रीय विद्रोह जिन्होंने उस प्रतिरोध को आकार दिया। (13)