पुराने मैसूर में 1857 हुआ ही नहीं, क्योंकि यहाँ कंपनी के हड़पने लायक़ कुछ था ही नहीं — यह राज्य पूरे दौर में एक सहायक सहयोगी के रूप में बचा रहा। इसलिए प्रतिरोध ने दो असामान्य शक्लें लीं। पहली थी 1830–31 में ख़ुद महाराजा के राजस्व प्रशासन के ख़िलाफ़ एक किसान विद्रोह, जिसका नतीजा पचास साल का सीधा कंपनी शासन रहा। दूसरी, एक सदी बाद, राज्य के भीतर उत्तरदायी शासन के लिए एक आंदोलन था, जो कांग्रेस के साथ-साथ चला पर जिसका निशाना राज के बजाय महल और दीवान थे, और जो बड़े पैमाने पर एक झंडा फहराने के अधिकार पर लड़ा गया। इसे परिभाषित करने वाली दो हत्याएँ, अप्रैल 1938 में विदुराश्वत्थ में, ख़ुद मैसूर राज्य की पुलिस ने कीं।
नगर का विद्रोह और 1831 का कमीशन1830–31
राजस्व की वसूली के ख़िलाफ़ किसानों का एक विद्रोह राज्य के उत्तर-पश्चिम में नगर के इलाके में शुरू हुआ — जिसे यहाँ मलनाड के साथ लिया गया है — और इतनी दूर तक फैला कि महाराजा की सरकार उसे दबा नहीं सकी।
परिणाम: 1831 में ईस्ट इंडिया कंपनी ने एक कमीशन के अधीन मैसूर का सीधा प्रशासन अपने हाथ में ले लिया। वोडेयारों ने 1881 की रेंडिशन तक दोबारा शासन नहीं किया।
शिवपुर का झंडा सत्याग्रहअप्रैल 1938
राजनीतिक सभाओं में कांग्रेस का झंडा फहराने पर मैसूर सरकार की पाबंदी को 11 अप्रैल 1938 से मद्दूर के पास शिवपुर में तोड़ा गया। आयोजकों में टी. सिद्दलिंगय्या, के. सी. रेड्डी, के. हनुमंतय्या और भूपालम चंद्रशेखरय्या शामिल थे, और यह अभियान पखवाड़े भर के भीतर राज्य के उत्तरी तथा पूर्वी तालुकों में फैल गया।
परिणाम: इस सत्याग्रह ने मैसूर के भीतर उत्तरदायी शासन की माँग को पहली बार गाँवों तक पहुँचाया।
विदुराश्वत्थ में गोलीबारी25 अप्रैल 1938
गौरीबिदनूर तालुक के विदुराश्वत्थ में कांग्रेस का झंडा फहराने के लिए जुटी भीड़ पर मैसूर राज्य की पुलिस ने गोली चलाई। समकालीन और बाद के वृत्तांत मृतकों की संख्या तीस से अधिक बताते हैं। इस जगह को स्थानीय तौर पर दक्षिण का जलियाँवाला बाग़ कहा जाता है।
परिणाम: मृतकों का दाह-संस्कार विदुराश्वत्थ मंदिर के पास किया गया, जहाँ एक स्मारक और बाद में एक स्कूल बना। गोलीबारी ने मैसूर सरकार और कांग्रेस के बीच बातचीत को मजबूर किया और यह राज्य के भीतर चले इस आंदोलन का मोड़ है।