अवध के प्रतिरोध के दो अलग-अलग दौर हैं, जिनके बीच संगठन के स्तर पर कुछ भी साझा नहीं है। पहला 1857 है, जिसे एक विस्थापित दरबार और वे तालुक़दार लड़े जिनकी भू-व्यवस्था को विलय ने हिला दिया था। दूसरा, सत्तर साल बाद का दौर, क्रांतिकारी है और बड़ी हद तक युवा, शहरी और पढ़ा-लिखा — और 1925 की काकोरी कार्रवाई लखनऊ की नज़र के दायरे में हुई, हालाँकि उसके लिए मुक़दमा झेलने वाले अधिकतर लोग रोहिलखंड के शाहजहाँपुर से थे।
रेज़िडेंसी की घेराबंदी30 जून – 17 नवंबर 1857
चिनहट में हार के बाद अंग्रेज़ी छावनी और नागरिक रेज़िडेंसी के अहाते में सिमट गए और लगभग पाँच महीने घेरे में रहे। खंडहर हो चुकी रेज़िडेंसी को बाद में जान-बूझकर बिना मरम्मत छोड़ दिया गया और यह 1857 का इकलौता बड़ा स्थल है जिसे पुनर्निर्मित करने के बजाय खंडहर के रूप में सुरक्षित रखा गया।
परिणाम: मार्च 1858 में दूसरी बार राहत-बल पहुँचने पर लखनऊ फिर से जीत लिया गया; शहर की क़िलेबंदी ढहा दी गई।
काकोरी कार्रवाई9 अगस्त 1925
हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के सदस्यों ने लखनऊ के पास काकोरी में 8-डाउन ट्रेन रोकी और उसमें ले जाया जा रहा सरकारी ख़ज़ाने का नक़द संगठन के ख़र्च के लिए ले लिया।
परिणाम: राम प्रसाद बिस्मिल, अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ, रोशन सिंह और राजेंद्र नाथ लाहिड़ी को 1927 में क्रमशः गोरखपुर, फ़ैज़ाबाद, इलाहाबाद और गोंडा में फाँसी दी गई — सज़ाएँ जान-बूझकर चार अलग-अलग शहरों में तामील की गईं।
अवध किसान सभा1920–1922
तालुक़दारी ज़िलों में लगान बढ़ाने और बेदख़ली के ख़िलाफ़ चला काश्तकारों का आंदोलन, जो रायबरेली, प्रतापगढ़ और फ़ैज़ाबाद के इर्द-गिर्द संगठित हुआ और थोड़े समय के लिए असहयोग आंदोलन के समानांतर चला।
परिणाम: 1921 के बाद दबा दिया गया; इसने जिन शिकायतों को नाम दिया, उन्होंने 1947 के बाद के भूमि-क़ानूनों को गढ़ा।