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अवध · Upper Indus–Gangetic Plain

पहनावा और वस्त्र

भारतीय पहनावे में अवध का योगदान कोई परिधान नहीं, बल्कि एक तकनीक है: सफ़ेद मलमल पर सफ़ेद धागा, इस तरह काढ़ा गया कि नक़्श रंग की नहीं बल्कि घनत्व की तब्दीली की तरह पढ़ा जाए। जिस दरबारी लिबास ने इसे ढोया — अंगरखा, चिकन का कुर्ता, फ़र्शी पायजामा — वह मुख्यतः औपचारिक पोशाक के रूप में बचा है, पर कढ़ाई दरबार से दो सदी ज़्यादा जी गई और अब इस क्षेत्र के किसी भी दूसरे शिल्प से ज़्यादा हाथों को काम देती है।

क्या पहना जाता है

चिकन का कुर्तापुरुष और महिलाएँ

बारीक सूती कपड़े, मलमल या जॉर्जेट पर सफ़ेद पर सफ़ेद कढ़ाई। इस इलाके का गर्मियों वाला परिधान, और वह एक चीज़ जो लगभग हर आने वाला अपने साथ ले जाता है।

किस मौके पर: गर्मी और औपचारिक अवसर

अंगरखापुरुष

बग़ल में बँधने वाला आड़ा दरबारी कोट, जिसका सीना लखनवी अंदाज़ में कँगूरेदार कटाव लिए होता है — आज हर जगह बिकने वाले आधुनिक अंगरखा-कुर्ते का पुरखा।

किस मौके पर: समारोह

फ़र्शी पायजामामहिलाएँ

घुटने से नीचे इतना चौड़ा काटा गया पायजामा कि वह फ़र्श पर फैल जाता है और चलते समय हाथ पर उठाकर सँभालना पड़ता है। शादियों और पुनरुद्धार-संग्रहों के बाहर यह लगभग लुप्त है।

किस मौके पर: नवाबी घरानों में औपचारिक अवसर

शरारा और गरारामहिलाएँ

चौड़े घेरदार पायजामे, जो घुटने पर गोटे की सजावटी पट्टी से जोड़े जाते हैं और छोटी कुर्ती तथा दुपट्टे के साथ पहने जाते हैं। गरारे की पहचान उसके घुटने वाली सिलाई से होती है।

किस मौके पर: शादियाँ, ईद

दो-पटली धोती और गमछापुरुष, ग्रामीण

गाँव के छोटे, दो-मोड़ वाले अंदाज़ में बाँधी गई धोती, कंधे पर गमछे के साथ।

किस मौके पर: रोज़मर्रा

बुनाई और कपड़े

लखनऊ चिकनकारी (Lucknow Chikankari)जीआई टैगलखनऊ, बाराबंकी, उन्नाव, सीतापुर

तीस से ज़्यादा नामित टाँकों वाली सफ़ेद पर सफ़ेद सतही कढ़ाई, जो हाथ से और अत्यधिक रूप से शहर तथा उसके चारों ओर बसे गाँवों की घरेलू कार्यशालाओं में महिलाओं द्वारा की जाती है। 2008 में भौगोलिक संकेतक के रूप में पंजीकृत।

लखनऊ ज़रदोज़ी (Lucknow Zardozi)जीआई टैगलखनऊ

सोने-चाँदी के तार, सितारे और सलमा-सितारा से किया जाने वाला धातु-धागे का काम, जो लकड़ी के अड्डे पर तने रेशम और मख़मल पर टाँका जाता है। 2013 में भौगोलिक संकेतक के रूप में पंजीकृत।

मुकैश (बदला)लखनऊ

चपटा किया हुआ धातु का तार कपड़े में से गुज़ारकर नन्ही-नन्ही बिंदियों में बल दिया जाता है, ताकि कपड़ा बिना किसी सतही कढ़ाई के चमके — फ़र्दी का काम। बदले के कारीगर अब बहुत कम बचे हैं।

कमदानीलखनऊ

बारीक मलमल पर धातु-धागे का हल्का काम, जो ऐतिहासिक रूप से दुपट्टों पर चिकनकारी के ऊपर किया जाता था।

गहने

झुमकानथबाजूबंदकरनफूलआड़गाँवों में चाँदी की पायल और बिछिया

अवध का पारंपरिक पहनावा — कपड़े, हथकरघा बुनाई, जीआई टैग वाले वस्त्र और गहने। (9)