यहाँ प्रतिरोध ने तीन असंबद्ध रूप लिए, और उन्हें एक साथ मिला देना तीनों को ग़लत ढंग से पेश करना होगा। पहला था 1799 और 1801 में दक्षिणी तथा पश्चिमी पालैयमों में पालैयक्काररों के विद्रोह, जो जोत और ख़िराज को लेकर लड़े गए और 1801–03 के बंदोबस्त से ख़त्म हो गए। दूसरा था 1906 के बाद का स्वदेशी आंदोलन, जो छपाई और सार्वजनिक सभाओं के रास्ते मदुरै पहुँचा और जिसने दक्षिणी ज़िलों में एक अल्पजीवी क्रांतिकारी धारा पैदा की, जो 1911 की ऐश हत्या और उसके बाद के मुक़दमों के साथ ख़त्म हुई। तीसरा, 1920 के दशक से, वही है जो टिका रहा: दो प्रतिद्वंद्वी सुधार आंदोलन — गांधीवादी कांग्रेस का काम, जो 1939 के मीनाक्षी मंदिर-प्रवेश तक ले गया, और 1925 में ईरोड में शुरू हुआ आत्म-सम्मान आंदोलन — और दोनों का निशाना औपनिवेशिक शासन जितना ही इस इलाके की अपनी व्यवस्था पर भी था।
दक्षिणी ज़िलों में स्वदेशी के वर्ष1906–1908
बंगाल के विभाजन के बाद, आयातित कपड़े के बहिष्कार और स्वदेशी उद्यम की वकालत पूरे दक्षिण में सार्वजनिक मंचों से की गई। सुब्रह्मण्य शिव और वी. ओ. चिदंबरम पिल्लै ने वैगै तथा ताम्रपर्णी के इलाक़ों में जगह-जगह भाषण दिए, और सुब्रह्मण्य भारती की कविता तथा पत्रकारिता ने यह तर्क तमिल में पहुँचाया। 12 मार्च 1908 को तूतीकोरिन में चिदंबरम पिल्लै और शिव की गिरफ़्तारी के बाद तिरुनेलवेलि शहर में गड़बड़ी हुई।
परिणाम: दोनों को सज़ा हुई; शिव जेल गए और वहीं उन्हें वह बीमारी लगी जिससे 1925 में उनकी मृत्यु हुई।
ऐश की हत्या और षड्यंत्र का मुक़दमा17 जून 1911
तिरुनेलवेलि के कलेक्टर रॉबर्ट ऐश को मणियाच्चि जंक्शन पर उनके रेल डिब्बे में शेनकोट्टै के वांचिनाथन ने गोली मारकर मार डाला, और फिर स्टेशन में ही ख़ुद को गोली मार ली। इसके बाद भारत माता एसोसिएशन के सदस्यों पर षड्यंत्र का मुक़दमा चला — यह संगठन 1908 की गड़बड़ी के बाद बना था।
परिणाम: सज़ाओं और उसके बाद की निगरानी ने दक्षिणी ज़िलों में क्रांतिकारी धारा को व्यवहार में ख़त्म कर दिया; उसके बाद इलाके की संगठित राजनीति कांग्रेस और आत्म-सम्मान आंदोलन के रास्ते चली।
मंदिर-प्रवेश आंदोलन1939
8 जुलाई 1939 को, तमिलनाडु हरिजन सेवा संघ के तत्कालीन अध्यक्ष ए. वैद्यनाथ अय्यर पी. कक्कन तथा अन्य दलित साथियों के साथ मदुरै के मीनाक्षी मंदिर में गए, और दक्षिण के सबसे बड़े मंदिरों में से एक से दलित उपासकों का बहिष्कार ख़त्म हुआ।
परिणाम: 1939 में ही बाद में मद्रास मंदिर-प्रवेश प्राधिकार एवं क्षतिपूर्ति अधिनियम पारित हुआ, जिसने इन प्रवेशों को क्षतिपूर्ति दी और आगे के प्रवेशों को अधिकृत किया।