डेल्टा का उपनिवेश-विरोधी इतिहास देर से शुरू होता है, संगठित है और लगभग पूरी तरह अहिंसक — और इसे सजा-सँवारकर पेश करने के बजाय साफ़-साफ़ कह देना ही ठीक है। 1857 में यहाँ कोई विद्रोह नहीं हुआ; 1855 में जब तंजावुर राज्य समाप्त हुआ तो जवाब बग़ावत नहीं, अर्ज़ी और मुक़दमेबाज़ी था। इस इलाके की एक बड़ी जन-कार्रवाई अप्रैल 1930 की वेदारण्यम नमक यात्रा है, और वेदारण्यम को ठीक इसीलिए चुना गया क्योंकि यहाँ का तट क़ुदरती नमक-मैदान है। उसके आगे राष्ट्रीय आंदोलन में डेल्टा का योगदान सशस्त्र प्रतिरोध से नहीं, छपाई, क़ानून और कांग्रेस के संगठन से होकर चला — और प्रवासियों से होकर, क्योंकि इस तट से जो मज़दूर सीलोन, मलाया, बर्मा और नाताल गए, वे राजनीति भी साथ ले गए।
तंजावुर का विलय और उसके ख़िलाफ़ अर्ज़ियाँ1855–1862
1855 में शिवाजी भोंसले के बिना पुरुष उत्तराधिकारी के निधन पर ईस्ट इंडिया कंपनी ने व्यपगत सिद्धांत लागू किया और तंजावुर राज्य समाप्त कर दिया। परिवार के दावे बग़ावत से नहीं, मद्रास और लंदन में ज्ञापनों तथा मुक़दमों के ज़रिए आगे बढ़ाए गए, और डेल्टा 1857–58 भर शांत रहा।
परिणाम: राज्य बहाल नहीं हुआ। महल, पुस्तकालय और परिवार की निजी संपत्ति वंश के पास ही रही।
वेदारण्यम नमक यात्रा13–30 अप्रैल 1930
सी. राजगोपालाचारी लगभग सौ चुने हुए स्वयंसेवकों को पैदल तिरुचिरापल्ली से कुंभकोणम, नीडामंगलम और तिरुत्तुरैपूंडि होते हुए वेदारण्यम के नमक-दलदलों तक ले गए — लगभग 150 मील — ताकि तट पर नमक क़ानून तोड़ा जा सके। वेदारण्यम का सुझाव सरदार वेदरत्नम पिल्लै ने दिया था, जिन्होंने रास्ता और पड़ाव तय किए।
परिणाम: राजगोपालाचारी 28 अप्रैल को एदंतेवर के नमक-दलदल पर गिरफ़्तार हुए और उन्हें छह महीने की सज़ा हुई; वेदारण्यम में गिरफ़्तार हुईं रुक्मिणी लक्ष्मीपति नमक सत्याग्रह में जेल जाने वाली पहली स्त्री बनीं; के. कामराज को दो साल मिले। ज़िले भर में लगभग 375 लोग गिरफ़्तार हुए। मार्च 1931 के गांधी–इर्विन समझौते के बाद क़ैदी रिहा कर दिए गए।