पहनावा और वस्त्र
डेल्टा में पहनावा दरबार के नहीं, मंदिर के इर्द-गिर्द बँधा है, और यही वजह है कि जो विशेषताएँ बची हैं वे अनुष्ठानिक हैं — दुल्हन की कूरै, नौ गज़ की मडिसार, और वह बिना सिली पंचकच्चम वेष्टि जो कोई पुरुष गर्भगृह में जाने के लिए पहनता है। बुनकर क़स्बे मंदिर-क़स्बों के बग़ल में उसी वजह से बैठे हैं जिस वजह से काँसा-ढलैये बैठे हैं, और इलाके का सबसे भारी ज़री रेशम सबसे बड़े मंदिरों से चंद किलोमीटर के भीतर बुना जाता है।
क्या पहना जाता है
मडिसारस्त्रियाँ, रूढ़िवादी और मंदिर से जुड़े घरों में
नौ गज़ की साड़ी, जिसे चुन्नट के साथ टाँगों के बीच से निकालकर लपेटा जाता है, ताकि पहनने वाली पालथी मारकर बैठ सके, पका सके और चढ़ सके, और उसे बार-बार ठीक न करना पड़े। अब यह ज़्यादातर समारोही है, और इस पट्टी में घरेलू अनुष्ठान करने वाली स्त्री के लिए आज भी यही ज़रूरी लपेट है।
किस मौके पर: अनुष्ठान और समारोह
पंचकच्चम वेष्टिपुरुष
एक ही बिना सिला कपड़ा, जिसे आगे चुन्नट देकर पीछे खोंस लिया जाता है और जिसे ऊपर का बदन खुला रखकर या अंगवस्त्रम के साथ पहना जाता है। डेल्टा के ज़्यादातर मंदिर एक हद से आगे प्रवेश के लिए आज भी इसकी माँग करते हैं, और यही वजह है कि यहाँ यह जीवित पहनावा है और कहीं और वेशभूषा।
किस मौके पर: मंदिर-प्रवेश, अनुष्ठान, विवाह
कूरै पुडवैदुल्हनें
दुल्हन की नौ गज़ की साड़ी, परंपरा से लाल-और-पीले या लाल-और-हरे मेल में और विपरीत रंग के किनारे के साथ, जिसे ताली बाँधे जाने से पहले दुल्हन की ननद उसे पहनाती है। इसका नाम कूरैनाडु से आया है — वह बुनकर गाँव, जो इसे देता था।
किस मौके पर: विवाह का मुहूर्तम
अंगवस्त्रमपुरुष
कंधे पर डाली गई सूती या रेशमी कपड़े की एक पट्टी, जो वही कपड़ा भी है जिसे पुजारी प्रसाद के साथ लौटाता है।
किस मौके पर: औपचारिक और अनुष्ठानिक
चमेली और कनकांबरम की लड़ीस्त्रियाँ
बालों में लगाए जाने वाले फूल, जो मुझम (muzham) के हिसाब से लिए जाते हैं — कोहनी से उँगली के सिरे तक की एक माप। यह सजावट से ज़्यादा एक रोज़ की ख़रीद है, जो घर लौटते हुए सड़क के फेरीवाले से लंबाई नपवाकर ली जाती है।
किस मौके पर: रोज़ाना
बुनाई और कपड़े
तिरुभुवनम रेशमी साड़ीजीआई टैगतंजावुर (तिरुभुवनम, कुंभकोणम के पास)
भारी शुद्ध रेशमी साड़ी, जिसमें दो ताने आपस में फँसाकर कोर्वै का विपरीत रंग वाला किनारा बुन दिया जाता है, ताकि किनारा शरीर से अलग न हो। यह उसी नाम के एक चोल मंदिर के बग़ल में बसे गाँव में बुनी जाती है। 2018-19 में भौगोलिक संकेतक के रूप में पंजीकृत।
कूरैनाडु साड़ीमयिलाडुतुरै (कूरैनाडु)
दुल्हन की कूरै — सूती और रेशम-सूती साड़ी, जो आज भी कूरैनाडु और उसके आसपास गड्ढे वाले करघों पर बुनी जाती है और आज भी पहनने के लिए नहीं, ख़ास तौर पर शादी के लिए ख़रीदी जाती है। चलन में ख़ूब, पर अपंजीकृत।
अय्यंपेट्टै और स्वामिमलै का ज़री रेशमतंजावुर
डेल्टा का दूसरा रेशम-गुच्छ, जो बड़े पैमाने पर कहीं और के शोरूमों के लिए ठेके की बुनाई करता है — यही एक वजह है कि उसका माल आमतौर पर किसी दूसरे क़स्बे के नाम से बिकता है।
गहने
ओड्डियाणम, कब्ज़ेदार कमरबंदवंकि, उलटे V आकार का बाजूबंदनेत्ति चुट्टि और जडै नागम नाम का केश-आभूषणकासु मालै, ढली हुई सोने की मुहरों की मालाभरतनाट्यम नर्तकियों का पहना जाने वाला मंदिर-आभूषण — ध्यान रहे कि इसका पंजीकृत भौगोलिक संकेतक दूर दक्षिण के नागरकोइल का है, इस क्षेत्र का नहीं