भोजपुर और पूर्वांचल · Middle & Lower Gangetic Plain
त्योहार
| त्योहार | कब | क्या होता है |
|---|---|---|
| छठ | कार्तिक (अक्टूबर–नवंबर) और चैत (मार्च–अप्रैल) | डूबते और उगते सूरज को अर्घ्य देने और उपवास के चार दिन। न पुरोहित, न प्रतिमा, न मंदिर। इससे पहले वाले हफ़्ते में यह क्षेत्र अपने प्रवासी मज़दूरों से ख़ाली हो जाता है, और बिहार तथा पूर्वी उत्तर प्रदेश की ओर जाने वाली हर रेल-लाइन भरी चलती है। |
| रामनगर की रामलीला | आश्विन से कार्तिक (सितंबर–अक्टूबर), इकतीस रातें | पूरे रामनगर क़स्बे में खेली जाती है, जिसमें हर प्रसंग की जगह तय है, कोई ध्वनि-विस्तारक नहीं है, और दर्शक लालटेन की रोशनी में पैदल चलकर कथा के पीछे-पीछे जाते हैं — यह 1830 के दशक से हर साल चली आ रही है। |
| देव दीपावली | कार्तिक पूर्णिमा (नवंबर) | दीवाली के बाद की पूर्णिमा पर वाराणसी के हर घाट की हर सीढ़ी पर लाखों दीये रखे जाते हैं और नदी एक सिरे से दूसरे सिरे तक जगमगा उठती है। इस क्षेत्र की सबसे ज़्यादा तस्वीरें खिंचने वाली अकेली रात। |
| मसान होली | होली से कुछ दिन पहले, मणिकर्णिका पर | श्मशान में चिताओं की राख रंग की तरह उड़ाई जाती है, इस तर्क पर कि शिव मुर्दों के साथ होली खेलते हैं। यह ठीक उतना ही विचलित करने वाला है और ठीक उतना ही उत्सवी, जितना सुनने में लगता है। |
| सोनपुर मेला | कार्तिक पूर्णिमा (नवंबर), पंद्रह दिन या उससे ज़्यादा | गंगा–गंडक संगम पर मवेशियों और घोड़ों का मेला, जो ऐतिहासिक रूप से एशिया का सबसे बड़ा पशु मेला रहा है, जिसके साथ एक स्नान-पर्व जुड़ा है और जिसके व्यापार में कभी हाथी भी शामिल थे। |
| नाग नथैया और भरत मिलाप | कार्तिक (अक्टूबर–नवंबर) | वाराणसी की दो प्रस्तुतियाँ, जिनके स्थल तय हैं और जिनकी परंपरा सदियों पुरानी है — तुलसी घाट पर कृष्ण का कालिय-दमन, और नाटी इमली पर राम और भरत का मिलन, जिसे कुछ ही मिनटों के लिए लाखों लोग देखते हैं। |
| सारनाथ में बुद्ध पूर्णिमा | वैशाख (अप्रैल–मई) | पहले उपदेश के स्थल पर जुलूस और रात भर चलने वाला अनुष्ठान। |
| गोरखनाथ का खिचड़ी मेला | मकर संक्रांति (जनवरी) | कई दिनों तक तीर्थयात्री गोरखनाथ को खिचड़ी चढ़ाते हैं, पूर्वी उत्तर प्रदेश के सबसे बड़े जाड़े के मेलों में से एक में। |
भोजपुर और पूर्वांचल का त्योहार कैलेंडर — क्या मनाया जाता है, कब पड़ता है और क्या होता है। (8)