बाक़ी भारत जिस कपड़े में ब्याह करता है, वह इसी क्षेत्र में बुना जाता है। बनारसी ब्रोकेड — सोने-चाँदी के धागे वाला रेशम — उत्तर भारत का मानक विवाह-वस्त्र है, जिसे वाराणसी, मुबारकपुर और मऊ के मुख्यतः मुसलमान बुनकर परिवार बुनते हैं और मुख्यतः हिंदू व्यापारिक घराने बेचते हैं; यह व्यवस्था सदियों से क़ायम है और आज भी इस क्षेत्र का सबसे परिणामकारी आर्थिक तथ्य है।
बनारसी साड़ीमहिलाएँ
कतान, ऑर्गेंज़ा, जॉर्जेट या शत्तीर रेशम में बुना ब्रोकेड, जिस पर जंगला, तनछोई, कटवर्क, टिश्यू और बूटीदार नमूनों में ज़री का काम होता है। उत्तर भारत की विवाह-साड़ी, और अब बढ़ते हुए दक्षिण की भी।
किस मौके पर: शादियाँ और औपचारिक अवसर
धोती, कुर्ता और गमछापुरुष
सफ़ेद या चारख़ाने वाला सूती कपड़ा, कंधे पर गमछे के साथ। भोजपुर में गमछा लगभग एक पहचान-चिह्न है और जहाँ भी उसका पहनने वाला जाता है, वहाँ साथ जाता है।
किस मौके पर: रोज़मर्रा और अनुष्ठान
लाल किनारी वाली साड़ीमहिलाएँ
रोज़ पहनने के लिए सूती, सिर पर खींची हुई, और शादियों तथा छठ के लिए रेशमी।
किस मौके पर: रोज़मर्रा
कुर्ता-पायजामा और टोपीपुरुष, बुनकर मोहल्लों में
वाराणसी के अंसारी बुनकर मोहल्लों — मदनपुरा, अलईपुरा और लल्लापुरा — का पहनावा, जहाँ ब्रोकेड का बड़ा हिस्सा असल में बनता है।
किस मौके पर: रोज़मर्रा और जुमा
बनारसी ब्रोकेड और साड़ियाँजीआई टैगवाराणसी, मऊ, आज़मगढ़ (मुबारकपुर), चंदौली
गड्ढे वाले और जैकार्ड करघों पर ज़री के साथ बुना रेशमी ब्रोकेड, जिसमें कढ़ुआ तकनीक से हर बूटा अलग काढ़ा जाता है ताकि कपड़े के पीछे कुछ भी न लटके। एक पंजीकृत भौगोलिक संकेतक, जो साड़ी, ब्रोकेड और कई संबद्ध उत्पादों को समेटता है।
भदोही का हाथ का क़ालीनजीआई टैगभदोही, मिर्ज़ापुर
हाथ से गाँठ लगाकर बनाए गए ऊनी क़ालीन, एक ऐसी पट्टी से जो भारत का सबसे बड़ा क़ालीन-समूह और एक बड़ा निर्यातक है। एक पंजीकृत भौगोलिक संकेतक।
निज़ामाबाद के काले मिट्टी-बर्तनजीआई टैगआज़मगढ़ (निज़ामाबाद)
यह कपड़ा नहीं, बल्कि इस क्षेत्र का दूसरा विशिष्ट उत्पाद है — मिट्टी को बंद भट्ठी में पकाकर गहरा काला किया जाता है और उस पर जस्ते-पारे के चाँदी जैसे नमूने जड़े जाते हैं। एक पंजीकृत भौगोलिक संकेतक।
कलमकारी शैली की मिर्ज़ापुरी दरीमिर्ज़ापुर
ज्यामितीय नमूनों में सपाट बुनी सूती और ऊनी दरियाँ, जो गाँठदार क़ालीन के कारोबार के साथ-साथ बनती हैं।