सुंदरबन राष्ट्रीय राजनीति का केंद्र नहीं था, और उसे कुछ और बताना उसका ग़लत वर्णन होगा। पूरे औपनिवेशिक दौर में यह सरहदी ज़मीन थी जो साफ़ की जा रही थी, जिसे लॉट-धारक थामे हुए थे और जिस पर हाल में आकर बसे लोग काम करते थे, और जितना संगठित प्रतिरोध हुआ उसने लगान, फ़सल के हिस्से और सफ़ाई की शर्तों को लेकर काश्तकार तथा बटाईदार आंदोलनों की शक्ल ली। इस क्षेत्र से जुड़ा इकलौता राष्ट्रीय स्तर पर जाना-पहचाना क्रांतिकारी प्रसंग कलकत्ता में हुआ, डेल्टा में नहीं। सुंदरबन ने अपनी ही ज़मीन पर जो सबसे बड़ी राजनीतिक घटना पैदा की वह 1946–47 का तेभागा आंदोलन है, और उसके तूफ़ान-केंद्र — काकद्वीप और नामखाना — द्वीप हैं, क़स्बे नहीं।
तीतूमीर का आंदोलन और बारासात का विद्रोह1827–1831
सैयद मीर निसार अली, जिन्हें तीतूमीर कहा जाता है, ने डेल्टा के उत्तरी, ज़मीन की ओर के छोर पर नारकेलबेड़िया इलाक़े में खेतिहरों को स्थानीय ज़मींदारों द्वारा लगाए गए उपकरों के ख़िलाफ़ और नील के बाग़ान मालिकों की माँगों के ख़िलाफ़ संगठित किया। उनके अनुयायियों ने नारकेलबेड़िया में बाँस का एक क़िलेबंद घेरा बनाया और कुछ समय तक आसपास के गाँवों में अपनी वसूली ख़ुद की।
परिणाम: तोपख़ाने के साथ कंपनी की एक टुकड़ी ने 19 नवंबर 1831 को उस घेरे पर धावा बोला। तीतूमीर उसी कार्रवाई में मारे गए और उनके प्रमुख साथियों पर मुक़दमा चला; आंदोलन उनके बाद टिक नहीं सका।
नील विद्रोह1859–1860
नदिया, जेसोर और 24 परगना के खेतिहरों ने — यानी उन्हीं ज़िलों के, जहाँ से सुंदरबन के बसने वाले आए थे — पेशगी व्यवस्था के तहत नील बोने से इनकार कर दिया, अपने खेत रोक लिए और बाग़ान मालिकों को अदालत तक खींचा।
परिणाम: नील आयोग ने 1860 में रिपोर्ट दी और निचले बंगाल में इसकी खेती तेज़ी से सिकुड़ गई। यह इनकार बड़ी हद तक कामयाब रहा, जो उन्नीसवीं सदी के किसी कृषि आंदोलन के लिए असामान्य है।
तेभागा आंदोलन1946–1947
बटाईदारों ने माँग की कि ज़मींदार का हिस्सा फ़सल के आधे से घटकर एक तिहाई हो जाए, और यह कि फ़सल बँटवारे तक बटाईदार के अपने खलिहान में रखी जाए। डेल्टा में काकद्वीप और नामखाना मुख्य केंद्र थे, और कैनिंग, भांगड़ तथा सोनारपुर में भी कार्रवाई हुई; औरतों की भागीदारी एक उल्लेखनीय विशेषता थी।
परिणाम: 1947 भर आंदोलन का सामना गिरफ़्तारियों और पुलिस कार्रवाई से हुआ। जिस एक-तिहाई हिस्से की माँग उसने की थी, वह बाद में काश्तकारी क़ानून में लिख दिया गया।