यहाँ दो बिलकुल अलग चीज़ें हुईं और उनमें से सिर्फ़ एक राष्ट्रीय थी। पहली पहाड़ियों का कोंध प्रतिरोध था, जो 1830 के दशक से 1850 के दशक तक चला और जिसका सवाल यह था कि प्रशासन ऐसे इलाक़े तक पहुँच रहा है जो कभी प्रशासित नहीं हुआ — उसके अगुआ वंशानुगत पहाड़ी अधिकारी थे, नेता नहीं, और उसकी माँगें पहाड़ियों के बारे में थीं, भारत के बारे में नहीं। दूसरी इस मैदान को मद्रास प्रेसीडेंसी से बाहर निकालने का अभियान था, जिसने लगभग 1903 से 1936 तक क्षेत्र का सार्वजनिक जीवन घेरे रखा और जिसे जन-आंदोलन ने नहीं, अख़बारों, ज्ञापनों और एक महाराजा ने ढोया। कांग्रेस का संगठन देर से आया, और जब 1930 में आया भी, तो हुमा के उसके नमक शिविर में ज़्यादातर वही लोग थे जो सीमा को लेकर बहस करते आ रहे थे। जो यहाँ 1857 ढूँढ़ने आएगा, उसे नहीं मिलेगा।
घुमसर की बग़ावतें1835–1837
मद्रास सरकार के साथ एक अनसुलझे राजस्व विवाद के दौरान 31 दिसंबर 1835 को राजा धनंजय भंज की मृत्यु ने ऊपरी ऋषिकुल्या के कोंध गाँवों को भंज परिवार के सदस्यों के साथ खुले प्रतिरोध में ला दिया। जॉर्ज एडवर्ड रसेल के नेतृत्व में कंपनी की एक टुकड़ी 11 जनवरी 1836 को इस इलाक़े में दाख़िल हुई और एक पहाड़ी अभियान लड़ा, जिसमें कोंधों ने टुकड़ी से आमने-सामने भिड़ने के बजाय जंगल और घाटों को बरता।
परिणाम: घुमसर सीधे प्रशासन में ले लिया गया। डोरा बिसोइ को 1837 में अंगुल के राजा ने अंग्रेज़ों को सौंप दिया; जिन पर मुक़दमे चले उनकी सज़ाएँ कुछ बरसों की क़ैद से लेकर देश-निकाला और मौत तक गईं।
कोंध बग़ावतें और मेरिया एजेंसी1837–1861
1845 से कोंध पहाड़ियों में एक विशेष एजेंसी काम करती रही, जिसका काम मेरिया प्रथा और उसके लिए बच्चों को उठाए जाने को ख़त्म करना था। उसके अफ़सर पहले बाहरी लोग थे जो इन गाँवों में नियमित रूप से आते-जाते थे, और उनकी मौजूदगी ने, श्रम तथा ख़िराज की नई माँगों के साथ मिलकर, इस इलाक़े को रह-रहकर बग़ावत में रखा। 1846 से इस प्रतिरोध का नेतृत्व चक्र बिसोइ ने घुमसर, कंधमाल और कालाहांडी की सीमाओं के आर-पार किया।
परिणाम: प्रथा दबा दी गई और पहाड़ियाँ एक स्थायी एजेंसी प्रशासन के अधीन ले आई गईं। चक्र बिसोइ कभी पकड़े नहीं गए और लगभग 1855 में अभिलेख से ग़ायब हो जाते हैं।
गंजाम के हस्तांतरण का अभियानलगभग 1903–1936
बरहमपुर और परलाखेमुंडी से चलाया गया अख़बारों तथा अर्ज़ियों का एक अभियान, जिसका पक्ष यह था कि उत्तरी मद्रास प्रेसीडेंसी के ओड़ियाभाषी इलाक़े बाक़ी ओड़िया ज़िलों से जोड़े जाएँ। यह उत्कल सम्मिलनी के अधिवेशनों, सीमा आयोगों को दी गई गवाहियों, और 1913 से बरहमपुर में शुरू हुए ओड़िया अख़बारों के ज़रिए चलाया गया।
परिणाम: गंजाम और परलाखेमुंडी का इलाक़ा 1 अप्रैल 1936 को उड़ीसा के नए प्रांत में स्थानांतरित कर दिए गए। दक्षिणी तेलुगु-बहुल मंडल मद्रास के साथ ही रह गए।
हुमा का नमक सत्याग्रहअप्रैल 1930
स्वयंसेवकों ने रंभा के पास हुमा में गंजाम के तट पर नमक बनाया, जो सविनय अवज्ञा आंदोलन में ज़िले का योगदान था। विश्वनाथ दास, निरंजन पटनायक और सरला देवी ने वह शिविर आयोजित किया।
परिणाम: पूरे ज़िले में गिरफ़्तारियाँ और गंजाम में कांग्रेस का पहला टिकाऊ संगठन, जो 1942 की भारत छोड़ो गिरफ़्तारियों तक चलता रहा।