रुहेलखंड का प्रतिरोध तीन ऐसी धाराओं में चलता है जो आपस में बमुश्किल जुड़ती हैं। 1857 में इस क्षेत्र ने कोई छापा नहीं, बल्कि एक प्रशासन खड़ा किया — ख़ान बहादुर ख़ाँ ने बरेली से ग्यारह महीने राजस्व अधिकारियों, अदालतों और डाक-व्यवस्था के साथ शासन किया — और उसने दिल्ली को उसका सबसे कारगर सैन्य सेनापति भी दिया, बिजनौर के बख़्त ख़ाँ, जो 1 जुलाई 1857 को बरेली ब्रिगेड के साथ शहर पहुँचे। रामपुर, इकलौती बची हुई रियासत, पूरे दौर अंग्रेज़ों के साथ रही, और यही वजह है कि उसका पुस्तकालय और उसके संगीतकार बने रहे जबकि बाक़ी क्षेत्र ने अपना ज़मींदार वर्ग खो दिया। बीसवीं सदी में इस क्षेत्र के दो योगदान आपस में कम ही मिले: रामपुर के अली बंधुओं का ख़िलाफ़त और असहयोग का नेतृत्व, और शाहजहाँपुर का वह क्रांतिकारी समूह जिसने 1925 की काकोरी कार्रवाई की — बिस्मिल, अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ और रोशन सिंह, तीनों शाहजहाँपुर के थे, हालाँकि मुक़दमा लखनऊ में चला और उन्हें आम तौर पर अवध के खाते में गिना जाता है। तराई के थारू और बुक्सा समुदाय इस सबसे नहीं, बल्कि वन और राजस्व नीति से प्रभावित हुए, और उन्होंने राष्ट्रवादी अभिलेख में लगभग कुछ नहीं छोड़ा।
बरेली का प्रशासन31 मई 1857 – मई 1858
18वीं और 68वीं नेटिव इन्फैंट्री तथा 8वीं इर्रेगुलर कैवलरी 31 मई 1857 को बरेली में उठ खड़ी हुईं। ख़ान बहादुर ख़ाँ को दिल्ली दरबार के नाम पर रुहेलखंड का शासन चलाने के लिए घोषित किया गया, उन्होंने एक मुख्य राजस्व अधिकारी और दीवानी न्यायाधीश नियुक्त किए, और यह व्यवस्था शाहजहाँपुर, मुरादाबाद, बदायूँ, बिजनौर और पीलीभीत तक बढ़ाई गई।
परिणाम: कॉलिन कैंपबेल के नेतृत्व में एक सेना ने 5 मई 1858 को बरेली की फ़ौज को हराया और 7 मई तक शहर पर क़ब्ज़ा कर लिया। ख़ान बहादुर ख़ाँ नेपाल पहुँचे, सौंप दिए गए, और 24 फ़रवरी 1860 को बरेली में उन्हें फाँसी दी गई।
दिल्ली में बरेली ब्रिगेडजुलाई – सितंबर 1857
बंगाल हॉर्स आर्टिलरी के चालीस साल की नौकरी वाले एक सूबेदार बख़्त ख़ाँ बरेली की टुकड़ियों को लेकर दिल्ली कूच कर गए और 1 जुलाई 1857 को शहर पहुँचे। उन्हें साहिब-ए-आलम बहादुर की उपाधि दी गई और व्यवहार में वहाँ की सिपाही सेनाओं के सेनापति वही थे, जो घेराबंदी भर वेतन और रसद सँभालते रहे।
परिणाम: सितंबर 1857 में दिल्ली गिर गई। बख़्त ख़ाँ लखनऊ और शाहजहाँपुर की ओर हट गए और 1859 में तराई में उनका निधन हुआ।
शाहजहाँपुर समूह और काकोरी कार्रवाई1924–1927
शाहजहाँपुर में राम प्रसाद बिस्मिल के इर्द-गिर्द बना एक क्रांतिकारी मंडल हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन में शामिल हुआ और 9 अगस्त 1925 को सरकारी ख़ज़ाने का पैसा छीनने के लिए काकोरी में एक ट्रेन रोकने में हिस्सा लिया।
परिणाम: बिस्मिल, अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ, रोशन सिंह और राजेंद्र नाथ लाहिड़ी को दिसंबर 1927 में फाँसी दी गई, और सज़ाएँ चार अलग-अलग क़स्बों में तामील की गईं।