मेवाड़ एक रियासत थी जिसके भीतर कोई ब्रिटिश ज़िला नहीं था, इसलिए यहाँ विरोध करने के लिए कोई औपनिवेशिक प्रशासन ही नहीं था और कांग्रेस की राजनीति देर से पहुँची — प्रजा मंडल तो 1938 में ही बना। इस इलाके के पास जो है वह भारत के सबसे लंबे लगातार चले किसान संघर्षों में से एक है, और दो बड़े आदिवासी आंदोलन, और ये सब अंग्रेज़ों की नहीं, राज्य तथा उसके जागीरदारों की ओर लक्षित थे। बिजोलिया आंदोलन 1897 में लागों और बेगार को लेकर शुरू हुआ और 1941 में भी चल रहा था। पहाड़ी ढलान के भील आंदोलनों ने इस इलाके की किसी भी क़स्बाई राजनीति से कहीं ज़्यादा लोगों को हिलाया, और 1913 के मानगढ़ जमावड़े तथा 1921–22 के एकी अभियान, दोनों का सामना सशस्त्र बल से किया गया। मेवाड़ के स्वतंत्रता संघर्ष को कांग्रेस की कहानी की तरह पढ़ना इस इलाके को उलटा पढ़ना है; वह पहले काश्तकारी और वन-अधिकारों की कहानी है।
बिजोलिया किसान आंदोलन1897–1941
चित्तौड़ पठार के पूर्वी ऊपरी इलाके में बसी बिजोलिया जागीर के काश्तकारों ने लगभग अस्सी अलग-अलग लागों के ख़िलाफ़, बेगार के ख़िलाफ़, और 1916 में थोपे गए युद्ध-चंदे के ख़िलाफ़ संगठन खड़ा किया। 1897 में एक शिष्टमंडल महाराणा के पास गया; 1913 में कर-बंदी अभियान चला; और 1916 से विजय सिंह पथिक ने इसे बिजोलिया किसान पंचायत के ज़रिए संगठित किया।
परिणाम: फ़रवरी 1922 के एक समझौते ने कई लागें हटा दीं। 1928 तक उल्लंघन की शिकायतें फिर शुरू हो गईं और आंदोलन चरणों में 1941 तक चलता रहा। यह रियासतों का सबसे लंबे समय तक चलने वाला किसान आंदोलन है।
बेगूं आंदोलन1921 से आगे
बिजोलिया का ढाँचा पड़ोसी बेगूं जागीर तक फैला, जहाँ काश्तकारों ने उन्हीं शर्तों पर बढ़ाई गई देयताओं और बेगार से इनकार किया।
परिणाम: रियायतें मिलीं, हालाँकि समझौते पर विवाद रहा; बेगूं इस बात का सबसे साफ़ प्रमाण है कि बिजोलिया एक क्षेत्रीय ढर्रा था, किसी एक जागीर का झगड़ा नहीं।
मानगढ़ का जमावड़ा17 नवंबर 1913
सुधारक गोविंद गुरु के भील और बंजारा अनुयायी इलाके के दक्षिणी छोर पर बांसवाड़ा–सुंठ सीमा पर मानगढ़ पहाड़ी पर जुटे, एक ऐसे आंदोलन के हिस्से के रूप में जो धार्मिक सुधार को बेगार तथा लागों से इनकार के साथ जोड़ता था। तितर-बितर होने की चेतावनी के बाद इंपीरियल सर्विस ट्रूप्स और मेवाड़ भील कोर ने इस जमावड़े पर गोली चलाई।
परिणाम: गोविंद गुरु और उनके सहयोगी पूंजा पारगी लगभग नौ सौ अन्य लोगों के साथ पकड़े गए। हताहतों के अनुमान कुछ दर्जन से लेकर पंद्रह सौ तक फैले हुए हैं और कोई विश्वसनीय गिनती मौजूद नहीं है।
भोमट का एकी आंदोलन1921–1929
कोल्हारी के व्यापारी मोतीलाल तेजावत ने भोमट भर के — खेरवाड़ा, कोटड़ा, झाड़ोल के — भील काश्तकारों को भू-राजस्व, लागों और बेगार से इनकार के लिए संगठित किया। महाराणा के सामने इक्कीस माँगें रखी गईं, जिन्हें "मेवाड़ की पुकार" के रूप में गढ़ा गया था।
परिणाम: 1922 में अठारह माँगें मान ली गईं; जंगल तक पहुँच, बेगार और शिकार के अधिकारों वाली माँगें ठुकरा दी गईं। तेजावत 1929 में गिरफ़्तार हुए और 1939 तक बिना मुक़दमे के क़ैद रहे।