यह आदिवासी-बहुल इलाक़ा है और इसका प्रतिरोध का इतिहास राष्ट्रीय समय-सारणी को नहीं, इसी बात को दर्शाता है। उन्नीसवीं सदी के यहाँ के विद्रोह उन पहाड़ों में प्रशासन के आ पहुँचने के बारे में थे जिन पर कभी शासन हुआ ही नहीं था, और उनका नेतृत्व राजनेताओं ने नहीं, पुश्तैनी पहाड़ी पदाधिकारियों ने किया। राष्ट्रीय राजनीति पठार तक बेहद देर से पहुँची: कोरापुट में लगभग 1929 से पहले व्यावहारिक रूप से कोई कांग्रेस संगठन था ही नहीं, और अगले दशक में वह बाज़ारू क़स्बों में नहीं, भूमिया, परजा, गदबा और कोंध खेतिहरों के बीच बना। यही आधार वह वजह है कि अगस्त 1942 की यहाँ की घटनाएँ गाँवों में झंडा फहराना और उनके जवाब में हुई गोलीबारियाँ थीं, और यही कि इस क्षेत्र की सबसे जानी-मानी शख़्सियत कोई वकील नहीं, एक गाँव का कांग्रेस अध्यक्ष था। घाट के नीचे, सामंती रियासतों में, माँग जितनी अंग्रेज़ों से थी उतनी ही शासक से भी, और उसने प्रजा मंडल आंदोलन की शक्ल ली।
कोंध विद्रोह और कालाहांडी की पहाड़ियों में एजेंसी1840 का दशक–1850 का दशक
मेरिया प्रथा ख़त्म करने के लिए बनाई गई विशेष एजेंसी घुमसर से कालाहांडी के कोंध इलाक़ों में घुसी। उसके अफ़सर वह पहला प्रशासन थे जिससे इनमें से कई गाँवों का कभी सामना हुआ था, और उनके साथ आई बेगार, कर और आवाजाही की माँगों को लगातार प्रतिरोध मिला, जिसका नेतृत्व 1846 से चक्र बिसोई ने किया, जो घुमसर, कंधमाल और कालाहांडी की सीमाओं के आर-पार घूमते रहे।
परिणाम: पहाड़ स्थायी एजेंसी निगरानी के नीचे ले आए गए। चक्र बिसोई कभी पकड़े नहीं गए और लगभग 1855 के आसपास अभिलेख से ग़ायब हो जाते हैं।
पठार पर सविनय अवज्ञा1930–1934
कोरापुट में पहली संगठित राष्ट्रीय राजनीतिक कार्रवाई। 1929 के सदस्यता अभियान के बाद राधाकृष्ण बिश्वासराय के नेतृत्व में भर्ती हुए स्वयंसेवक सविनय अवज्ञा आंदोलन में शामिल हुए और गिरफ़्तारी दी।
परिणाम: गिरफ़्तारियाँ और छोटी सज़ाएँ, और एक ज़िला कांग्रेस संगठन जो लगभग शून्य से बढ़कर अक्टूबर 1938 तक पचास हज़ार से ज़्यादा दर्ज सदस्यों तक पहुँच गया।
कोरापुट में भारत छोड़ोअगस्त 1942
21 अगस्त 1942 को लक्ष्मण नायक ने गाँववालों को मथिली के थाने पर कांग्रेस का झंडा फहराने के लिए ले गए; पुलिस ने भीड़ पर गोली चलाई और बहुत से लोग मारे तथा घायल हुए। उसी महीने बाद में नबरंगपुर के इलाक़े में पापड़ाहांडी में हुई गोलीबारी में बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी मारे गए। ऐसी ही कार्रवाइयाँ उमरकोट, रायघर, पड़वा, नंदापुर, जयपोर और मलकानगिरि में दर्ज हुईं।
परिणाम: पूरे ज़िले में सामूहिक गिरफ़्तारियाँ। लक्ष्मण नायक पर हत्या का आरोप लगा, 13 नवंबर 1942 को सज़ा सुनाई गई और 29 मार्च 1943 को बरहमपुर जेल में फाँसी दे दी गई।
सामंती रियासतों में प्रजा मंडल आंदोलन1937–1947
घाट के नीचे की रियासतों में माँग बेगार तथा मनमानी वसूली ख़त्म करने और संगठन तथा प्रकाशन के अधिकारों की थी। 1937 में दूसरे अखिल उड़ीसा राज्य प्रजा सम्मेलन के बाद ज़्यादातर गढ़जात रियासतों में प्रजा मंडल बने, और 29 अक्टूबर 1938 को एक अखिल उड़ीसा गढ़जात दिवस मनाया गया।
परिणाम: रियासतों के प्रशासन जाँच के दायरे में आए और 1947 के अंत तक उनमें से लगभग सभी प्रांत में विलय पर राज़ी हो गए।