इन सात ज़िलों के दो राजनीतिक इतिहास थे जो कभी आपस में नहीं मिले। इनमें से पाँच निज़ाम के इलाक़ों के भीतर पड़ते थे, जहाँ भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की कोई हैसियत नहीं थी, और जहाँ 1938 में बनने के कुछ ही हफ़्तों के भीतर हैदराबाद स्टेट कांग्रेस को ग़ैरक़ानूनी घोषित कर दिया गया और वह अप्रैल 1946 तक प्रतिबंधित रही — यानी संगठित राष्ट्रवादी राजनीति यहाँ मुश्किल से एक दशक ही रही, और ज़्यादातर सत्याग्रह तथा गिरफ़्तारी के रूप में। बल्लारी, जो 1800 में कंपनी को सौंप दिया गया था, एक साधारण मद्रास प्रेसीडेंसी ज़िला था जिसमें साधारण कांग्रेसी राजनीति चलती थी। इस पठार का सबसे अच्छी तरह दर्ज प्रतिरोध इन दोनों धाराओं से पुराना है: 1857–58 में सुरपुर की बेडर सरदारी, और जून 1858 में कोप्पल की लड़ाई। निज़ाम के कन्नड़ ज़िलों से नाम लेकर दर्ज व्यक्तिगत जीवनियाँ अभिलेख में पतली हैं, और वह पतलापन सीधे-सीधे इसका नतीजा है कि यहाँ संगठित राजनीति कितने कम समय के लिए मंज़ूर थी।
सुरपुर विद्रोह1857–1858
आज के यादगिर ज़िले में कृष्णा पर बसी सुरपुर की बेडर सरदारी ने उत्तर की बग़ावत के दौरान अपने राजा वेंकटप्प नायक के नेतृत्व में ईस्ट इंडिया कंपनी के ख़िलाफ़ कार्रवाई की।
परिणाम: यह सरदारी 1858 में ख़त्म कर दी गई और उसका राजा वह साल नहीं देख सका।
कोप्पल क़िले की कार्रवाईजून 1858
नरगुंद के भास्कर राव भावे ने कोप्पलदुर्ग का क़िला लिया और अपने ख़िलाफ़ भेजी गई टुकड़ी के सेनापति को मार डाला। मुंडरगि भीमराव और हम्मिगे केंचनगौड इसी विद्रोह में लड़े।
परिणाम: भीमराव और केंचनगौड जून 1858 में कोप्पल में मारे गए और क़िला वापस ले लिया गया।
हैदराबाद स्टेट कांग्रेस का सत्याग्रहअक्टूबर – दिसंबर 1938
हैदराबाद स्टेट कांग्रेस, जो 1938 में बनी और उसी साल 6 सितंबर के एक लोक सुरक्षा अधिनियम के तहत ग़ैरक़ानूनी ठहरा दी गई, ने एक कार्रवाई समिति बनाई और 24 अक्टूबर को सत्याग्रह शुरू किया। उसी दिन एक अलग अभियान के रूप में आर्य समाज और हिंदू महासभा का सत्याग्रह भी शुरू हुआ।
परिणाम: स्टेट कांग्रेस ने क़रीब तीन सौ कार्यकर्ताओं के गिरफ़्तारी देने के बाद 24 दिसंबर को अपना आंदोलन स्थगित कर दिया। संगठन पर लगा प्रतिबंध अप्रैल 1946 तक नहीं हटाया गया।