डुग्गर एक रियासत का शासक हिस्सा था, कोई उपनिवेश बना ज़िला नहीं, और उसके प्रतिरोध के रिकॉर्ड की हर बात इसी से तय होती है। यहाँ ठुकराने के लिए कोई ब्रिटिश कलेक्टर नहीं था, मेड़ों की इस तरफ़ भारत छोड़ो की कोई गिरफ़्तारियाँ नहीं हुईं, और 1857 में रियासत के सिपाही कंपनी के लिए कूच कर गए। इसके बजाय इस क्षेत्र के पास दो पुरानी धाराएँ हैं और एक देर की। पुरानी धाराएँ कृषि की हैं: झिड़ी की वह परंपरा, जिसमें एक किसान ने ज़मींदार की अनाज की माँग ठुकरा दी थी और जिसकी याद आज भी शरद के एक बड़े मेले में रखी जाती है, और 1808 के बाद सिख कर-वसूली मानने से मियाँ दीदो का दर्ज इनकार। देर वाली धारा 1920 और 1930 के दशकों की राजनीति है, जिसने पहले रियासती नौकरी और रियासती प्रजा के अधिकार के लिए दबाव डालती संस्थाओं की शक्ल ली, और 1931 के बाद महाराजा से ज़िम्मेदार शासन माँगते राजनीतिक दलों की। नीचे दिए गए जम्मू के नेता उसी आंदोलन के हैं, और यह विवरण 1947 पर रुक जाता है।
बाबा जित्तो और झिड़ी की परंपरापरंपरा के अनुसार, सोलहवीं सदी
एक किसान, जिसके बारे में कहा जाता है कि उसने जम्मू के पास झिड़ी में बंजर ज़मीन को खेती लायक़ बनाया और फिर फ़सल में बड़ा हिस्सा माँगने की ज़मींदार की माँग ठुकरा दी, और वह हिस्सा देने के बजाय जान दे दी। यह कथा दस्तावेज़ नहीं, मौखिक परंपरा है, और उसकी तिथि अनिश्चित है।
परिणाम: हर शरद में लगने वाला झिड़ी का मेला इस क्षेत्र के सबसे बड़े जमावड़ों में है, और यह कथा किसी कृषि-शिकायत का उधार लिया हुआ नहीं, इस क्षेत्र का अपना विवरण है।
मियाँ दीदो का प्रतिरोधलगभग 1808–1821
1808 में रणजीत सिंह द्वारा जम्मू के विलय के बाद मियाँ दीदो जम्वाल ने झुकने से इनकार कर दिया और शिवालिक के पहाड़ों से एक लंबा अनियमित प्रतिरोध चलाया, जिसमें उन्होंने किसानों के सहयोग से राजस्व-वसूली में अड़चन डाली और छावनी की चौकियों पर धावे बोले।
परिणाम: त्रिकूट के पहाड़ों में सिख फ़ौज ने उन्हें घेरकर मार डाला; इस प्रतिरोध की याद मुख्यतः डोगरी गाथाओं के ज़रिए बची है।
रियासती प्रजा का आंदोलन1920 का दशक
डोगरा और कश्मीरी संस्थाओं के ज़रिए चलाया गया एक संगठित अभियान, जो रियासती नौकरियों में बाहरी लोगों की भर्ती के ख़िलाफ़ और ग़ैर-निवासियों द्वारा ज़मीन ख़रीदे जाने के ख़िलाफ़ था।
परिणाम: 1927 की वंशानुगत रियासती प्रजा की परिभाषा ने रियासती नौकरी और ज़मीन रखने का हक़ रियासती प्रजा तक सीमित कर दिया, और यही रियासत में निवास-अधिकारों का आधार बन गई।
जम्मू का प्रतिनिधिमंडल और 1931 का आंदोलन1931
जम्मू की यंग मेन्स मुस्लिम एसोसिएशन ने रोज़गार, शिक्षा और धार्मिक व्यवहार से जुड़ी शिकायतें महाराजा के सामने रखने के लिए प्रतिनिधि चुने, और यह श्रीनगर की उन बैठकों के समानांतर हुआ जो 13 जुलाई 1931 की गोलीबारी से पहले हुई थीं।
परिणाम: ग्लैंसी आयोग ने 1932 में अपनी रिपोर्ट दी, उसी साल रियासत के पहले राजनीतिक दल बने, और 1934 में आंशिक रूप से चुनी हुई प्रजा सभा आई।