पहनावा और वस्त्र
पठार का पहनावा बिना सिला, सूती, और किनारे के रंग से एक नज़र में पहचाना जाने वाला है। संताल पंछी-परहन — रंगीन किनारे वाला सादा सफ़ेद या क्रीम कपड़ा, जो नीचे लपेटा और ऊपर ओढ़ा जाता है — इसका सबसे संहिताबद्ध रूप है, और वही दो-टुकड़ों वाला तर्क मुंडा, हो तथा उराँव पहनावे में भी चलता है। इस क्षेत्र के वस्त्रों का वज़न तसर रेशम में है, जो खेत में नहीं, जंगल के पेड़ों पर पाला जाता है, और उस चाँदी तथा पीतल के गहने में है जो किसी घर की जमा पूँजी होता है। सोहराय और खोवर इस क्षेत्र की बड़ी सतह-अलंकरण परंपरा हैं, पर वे दीवारों पर लगाई जाती हैं, कपड़े पर नहीं।
क्या पहना जाता है
पंछी और परहनसंताल महिलाएँ
सूती कपड़े के दो टुकड़े — एक कमर पर लपेटा हुआ, एक ऊपरी बदन पर — सादे, आम तौर पर सफ़ेद या क्रीम, लाल, हरे या नीले किनारे के साथ। बाहा और सोहराय पर किनारा चौड़ा हो जाता है और जूड़े में साल या पलाश के फूल लगते हैं।
किस मौके पर: रोज़मर्रा और त्योहार
पंछी और भगवानसंताल और मुंडा पुरुष
खेत और जंगल के काम के लिए टाँगों के बीच से कसकर बाँधी गई एक छोटी धोती, और कंधे पर डाला या ढोने के लिए सिर पर बाँधा गया एक दूसरा कपड़ा।
किस मौके पर: रोज़मर्रा
करिया और कछनीउराँव और मुंडा महिलाएँ
चौड़े रँगे किनारों वाले मोटे सूती लपेटे, जो अखड़ा (Akhra) यानी नाचने की जगह के लिए कसकर पहने जाते हैं, जहाँ पंक्ति कंधे से कंधा मिलाकर चलती है और ढीला कपड़ा ख़तरा है।
किस मौके पर: रोज़मर्रा और नृत्य
तसर रेशम की साड़ीमहिलाएँ, विवाह पर
अपने प्राकृतिक शहद-रंग में बिना रँगा या हल्का रँगा तसर, जो कुचाई और भगैया के आसपास बुना जाता है, और तब पहना जाता है जब घर कोई अवसर मना रहा हो।
किस मौके पर: विवाह और त्योहार
सरायकेला की छऊ पोशाकनर्तक
कसा हुआ ऊपरी वस्त्र, लपेटा हुआ निचला परिधान और चित्रित मुखौटा — पोशाक मुखौटे के इर्द-गिर्द गढ़ी जाती है, उलटा नहीं, और परिधान इस तरह काटा जाता है कि वह मशाल की रोशनी में दूर से पढ़ा जा सके।
किस मौके पर: चैत्र पर्व
बुनाई और कपड़े
कुचाई तसरसरायकेला-खरसावाँ, पश्चिमी सिंहभूम
पठार के जंगल में अर्जुन और असन पर पाले गए ऐंथेरिया माइलिटा के कोयों से उतारा गया रेशम। झारखंड भारत का सबसे बड़ा तसर उत्पादक राज्य है, और कुचाई उसका सबसे जाना-पहचाना पालन तथा धागा उतारने का समूह। इसका अपना कोई भौगोलिक संकेतक नहीं।
सोहराय और खोवर दीवार-चित्रणजीआई टैगहज़ारीबाग़
कपड़ा नहीं, बल्कि इस क्षेत्र की पंजीकृत सतह-अलंकरण परंपरा — नीचे शिल्प वाली प्रविष्टि देखिए। 2020 में भौगोलिक संकेतक के रूप में पंजीकृत, इस क्षेत्र से पहली।
लाख की चूड़ी और गहने का कामखूँटी, राँची
लाख की राल, जो कुसुम और पलास के पेड़ों पर पाले जाने वाले एक कीट से निकलती है, चूड़ियों और जड़ाई में ढाली जाती है। भारत की ज़्यादातर लाख झारखंड पैदा करता है और उसका राष्ट्रीय शोध संस्थान राँची के नामकुम में है।
गहने
हँसुली — चाँदी का कड़ा गलहार, दुल्हन का मानक गहनाकलाई और टख़ने पर चाँदी के बाला और कड़ेकई लड़ियों में पहनी जाने वाली मनकों की मालाएँलाख की चूड़ियाँपीतल के हेयर पिन और कंघेबाहा और सरहुल पर जूड़े में लगाए जाने वाले फूल, जिन्हें सजावट नहीं, गहना माना जाता है