उत्तर कन्नड़ का विलय देर से हुआ और उसका प्रशासन अजीब ढंग से चला — 1799 में बाक़ी कनारा के साथ लिया गया, साठ साल मद्रास प्रेसिडेंसी में रखा गया, और केवल 1862 में बंबई भेजा गया — और उसकी राजनीति उसी प्रेसिडेंसी के पीछे चली जिसमें वह जा पड़ा। इसीलिए ज़िले का स्वतंत्रता-आंदोलन तटीय मद्रास के आंदोलन जैसा नहीं बल्कि बंबई दक्खन के आंदोलन जैसा पढ़ा जाता है, और इसीलिए वह एक ही साल में अपने शिखर पर पहुँचा। अंकोला ने 13 अप्रैल 1930 को चालीस हज़ार आँकी गई भीड़ के सामने नमक क़ानून तोड़ा, सत्याग्रह पैंतालीस दिन चलाया, और फिर उसके बाद हुई ज़ब्तियों के बीच एक कर-निषेध अभियान चलाया; इसी के लिए उस तालुक को कर्नाटक का बारडोली कहा गया। उससे पहले ज़िले का रिकॉर्ड पतला और छिटपुट है — सुपा और दांडेलि में वे विद्रोह जो 1857 के विप्लव के साथ पड़े — क्योंकि घाट के जंगल पर शासन नहीं बल्कि प्रशासन चलता था और वहाँ इतनी स्थानीय सरदारियाँ बची ही नहीं थीं कि कुछ खोया जाता।
सुपा और दांडेलि के विद्रोह1857–1858
काली के बेसिन में सुपा में, जो अब जोयडा तालुक है, और दांडेलि में हुए विद्रोह, जो उत्तर के विप्लव के साथ पड़े और नरगुंद, बागलकोट तथा हलगलि वाले उसी समूह के हैं।
परिणाम: बाक़ी दक्खन के विद्रोहों के साथ दबा दिए गए; चार साल बाद ज़िले को बंबई प्रेसिडेंसी में पुनर्गठित कर दिया गया।
अंकोला नमक सत्याग्रह13 अप्रैल 1930
एम. पी. नाडकर्णी ने अंकोला में लगभग चालीस हज़ार आँकी गई भीड़ के सामने नमक क़ानून तोड़ा। रेवु होन्नप्पा नायक और होन्नप्पा मंगेशकर ने अवैध नमक की पहली पुड़िया नीलामी में तीस रुपये में ख़रीदी। मंच पर मौजूद लोगों में कर्नाड सदाशिव राव, बसगोड राम नायक, उमाबाई कुंदापुर और एन. एस. हर्डीकर थे।
परिणाम: नेता तुरंत गिरफ़्तार कर लिए गए; सत्याग्रह पैंतालीस दिन चलता रहा।
कनारा के तालुकों में कर-निषेध अभियान1930–31
भू-राजस्व देने से इनकार के लिए चुने गए चार तालुकों में अंकोला एक था। जोतें ज़ब्त करके नीलाम की गईं, और उसके बीच भी अभियान चलता रहा।
परिणाम: अंकोला को बाद में कर्नाटक का बारडोली कहा गया। सविनय अवज्ञा के वर्षों में कर्नाटक के ज़िलों भर में पंद्रह सौ से अधिक कार्यकर्ता गिरफ़्तार हुए।