BharatSangraha

ब्रज · Upper Indus–Gangetic Plain

लोग

नामवर्षक्षेत्रकिसलिए मशहूर
सूरदासलगभग 1478–1580कविअष्टछाप के अंधे कवि, जिनका नाता गोवर्धन से है, और जिनका 'सूरसागर' ब्रजभाषा में कृष्ण-काव्य का सबसे बड़ा भंडार है और जिसे आज भी साहित्य की तरह पढ़ा नहीं, उपासना की तरह गाया जाता है।
वल्लभाचार्य1479–1531दार्शनिक और संप्रदाय-प्रवर्तकगोवर्धन पर पुष्टिमार्ग की स्थापना की, आठ दैनिक सेवाओं वाली हवेली-उपासना का रूप गढ़ा, और वह मंदिर-खान-परंपरा तय की — प्याज़ नहीं, लहसुन नहीं, मौसमी भोग — जिस पर अब पूरा क्षेत्र चलता है।
चैतन्य महाप्रभु1486–1534धर्म-सुधारक1515 में बंगाल से आए और ब्रज के खोए हुए स्थलों की पहचान की; उनके छह गोस्वामी शिष्य वृंदावन में बस गए और वहाँ के मंदिर तथा धर्म-चिंतन खड़ा किया, यही वजह है कि वृंदावन पाँच सदियों से एक बंगाली क़स्बा रहा है।
स्वामी हरिदासलगभग 1512–1607संगीतकार और संतनिधिवन में रहे, हरिदासी संप्रदाय और समाज गायन की परंपरा की नींव रखी, और तानसेन के गुरु के रूप में याद किए जाते हैं — ब्रज के मंदिर-संगीत और उत्तर भारतीय शास्त्रीय संगीत के बीच की कड़ी।
रसखानलगभग 1548–1628कविएक मुस्लिम कवि, जिन्होंने ब्रजभाषा में कृष्ण पर सबसे ज़्यादा उद्धृत की जाने वाली कुछ कविताएँ लिखीं और जो महावन में दफ़्न हैं। उनकी समाधि एक तीर्थस्थल है, और जो कोई ब्रज को सरल बना देना चाहता है उसके लिए वे इस क्षेत्र का खड़ा हुआ उत्तर हैं।
बिहारी लाल1595–1663कवि'सतसई' के रचयिता, ब्रजभाषा के सात सौ दोहे, जो हिंदी कविता में संक्षिप्तता का प्रतिमान बन गए।
हरिराम व्यास और अष्टछाप कविसोलहवीं सदीकवि और गायकपुष्टिमार्ग के वे आठ कवि जिनके पदों से हवेली का भंडार बना है, और जो ख़ास-ख़ास रागों तथा ठाकुर जी के दिन के ख़ास-ख़ास पहरों से बँधे हुए हैं।
महाराजा सूरजमल1707–1763शासकभरतपुर के जाट शासक, जिन्होंने डीग और लोहागढ़ बनवाए और गोवर्धन परिक्रमा-मार्ग के बलुआ पत्थर के कुंडों तथा छतरियों का ख़र्च उठाया — इस क्षेत्र के सबसे बड़े लौकिक निर्माता।
ए. सी. भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद1896–1977धर्म-गुरु1966 में न्यूयॉर्क में इस्कॉन की स्थापना की और वृंदावन में कृष्ण-बलराम मंदिर बनवाया, जिसने ब्रज को एक वैश्विक अनुयायी-समुदाय वाला गंतव्य बना दिया और क़स्बे की आबादी की बनावट स्थायी रूप से बदल दी।
पद्माकर1753–1833कविब्रजभाषा में रीति परंपरा के आख़िरी बड़े कवियों में से एक, जो उत्तर भारत के दरबारों में काम करते रहे, उसी समय जब यह साहित्यिक भाषा खड़ी बोली को जगह देने लगी थी।

ब्रज के वे लोग जिन्होंने यहाँ के इतिहास, कला, विज्ञान, खेल और सार्वजनिक जीवन को गढ़ा। (10)