ब्रज का उपनिवेश-विरोधी इतिहास किसी एक आंदोलन की कहानी नहीं है, और यहाँ भक्ति वाला क्षेत्र और राजनीतिक क्षेत्र मुश्किल से ही एक-दूसरे को छूते हैं। ब्रज के भीतर 1857 में विद्रोह का नेतृत्व करने के लिए कोई शासक-वंश था ही नहीं — भरतपुर एक संरक्षित रियासत था और उसने ख़ुद को अलग रखा — इसलिए मथुरा के देहात में जो हुआ उसका नेतृत्व गाँव के लोगों ने किया, और वह ज़िला दफ़्तर के ख़िलाफ़ जितना था उतना ही साहूकार के बहीखातों और राजस्व के रिकॉर्ड के ख़िलाफ़ भी था। सत्तर साल बाद इस क्षेत्र ने राष्ट्रीय स्तर की जो इकलौती शख़्सियत दी, मुरसान के राजा महेंद्र प्रताप, उन्होंने लगभग पूरा काम भारत के बाहर किया और बत्तीस साल विदेश में बिताए। ख़ुद परिक्रमा के क़स्बों ने उल्लेखनीय रूप से बहुत कम संगठित राष्ट्रवादी राजनीति पैदा की।
राया का विद्रोहजून – सितंबर 1857
मथुरा ज़िले के तप्पा राया के एक किसान देवी सिंह ने, जिन्हें स्थानीय तौर पर साधु राजा कहा जाता था, ज़िला प्रशासन के ढह जाने के बाद क़रीब साठ जाट गाँव खड़े किए। इस विद्रोह ने पुलिस चौकी और नील की फ़ैक्ट्री जलाई, राजस्व के रिकॉर्ड और साहूकारों के बंधपत्र नष्ट किए, और पूरी गर्मी अपनी संक्षिप्त अदालत चलाई।
परिणाम: आगरा से भेजी गई एक सेना ने इसे तोड़ा। देवी सिंह और उनके साथी श्रीराम को 17 सितंबर 1857 को फाँसी दी गई और आचार्य गाँव नष्ट कर दिया गया।
आगरा मंडल का ढहना और सँभलना1857
मई के आख़िर में मथुरा के ख़ज़ाने का रक्षक दस्ता विद्रोह कर बैठा और ज़िला मजिस्ट्रेट घोड़े पर आगरा चले गए; इसके बाद जुलाई में ब्रिगेडियर पोलवील के अधीन आगरा की छावनी शहर के बाहर हार गई और यूरोपीय आबादी आगरा के क़िले में सिमट गई।
परिणाम: सत्ता तभी बहाल हुई जब दिल्ली गिरी और 10 अक्टूबर 1857 को एक टुकड़ी ने आगरा के सामने विद्रोही सेना को हरा दिया।
काबुल की अस्थायी सरकार1915–1919
मुरसान के राजा महेंद्र प्रताप द्वारा 1 दिसंबर 1915 को काबुल में घोषित एक निर्वासित सरकार, जिसके प्रधानमंत्री मौलाना बरकतुल्लाह थे, और जो पहले विश्वयुद्ध के दौरान जर्मनी, उस्मानी तुर्की तथा अफ़ग़ानिस्तान से मान्यता और समर्थन चाहती थी।
परिणाम: उसे कोई औपचारिक मान्यता नहीं मिली और युद्ध के बाद वह भंग हो गई। महेंद्र प्रताप 1946 तक विदेश में ही रहे।