दोतीवाला बेकरीसूरतसे Mid nineteenth century
सूरती बताशा, नानखताई और खारी
एक पारसी बेकरी, जिसकी उत्पाद-सूची आमतौर पर डच जहाज़ी रोटी से जोड़ी जाती है, जिसे यूरोपीय कोठियों के समेटे जाने के बाद स्थानीय बिक्री के लिए ढाल लिया गया। बताशा उसी का सीधा वंशज है।
चौक बाज़ार और गोपीपुरा के लोचे के खोमचेसूरत
लोचो, सेव खमणी और खमण, तड़के सुबह से
कोई एक पता नहीं, एक गुच्छा। लोचो खड़े-खड़े, चम्मच से खाया जाता है, और बाँधकर ले जाने में बचता नहीं।
सूरत के घारी बनाने वालेसूरत
घारी, चांदनी पड़वो से पहले वाले हफ़्ते में
पुराने शहर के कई पुराने जमे हुए हलवाई घराने उस हफ़्ते लगातार काम करते हैं। मौसम के बाहर यह मिठाई मिलती तो है, पर वह वही मौक़ा नहीं होता।
उदवाड़ा के पारसी भोजनालयउदवाड़ा, वलसाड़ ज़िला
तयशुदा पारसी भोजन — धानसाक, पात्रा नी मच्छी, साली बोटी
गाँव के कुछ गिने-चुने गेस्ट हाउस और छोटे भोजनालय सैलानियों को पूरे पारसी मेन्यू परोसते हैं, ज़्यादातर सप्ताहांत पर। अग्नि मंदिर ख़ुद ग़ैर-ज़रथुश्तियों के लिए बंद है; खाना नहीं।
सोस्योसूरतसे 1920s
स्थानीय रूप से बना फल-और-मसाले वाला एक शीतल पेय
दोनों विश्वयुद्धों के बीच के वर्षों से सूरत में बन रहा है और आज भी मुख्यतः एक क्षेत्रीय पेय है। इसे मँगाना सैलानी नहीं, लौटा हुआ सूरती पहचाने जाने का सबसे तेज़ तरीक़ा है।
पुराने शहर की ज़री कार्यशालाएँसूरत
खींचा और चपटा किया धातु का धागा, बदला, कसब और सलमा-सितारा
पुराने मुहल्लों भर की छोटी इकाइयों में तार खींचने की बेंचें और लपेटने के फ़्रेम। उनका ज़्यादातर उत्पादन दूसरे राज्यों के बुनाई केंद्रों को चला जाता है।
आहवा और वघई के साप्ताहिक हाटआहवा और वघई, डांग ज़िला
नागली, वन-उपज, बाँस का काम और महुआ
तय दिनों पर लगते हैं, और यह देखने का व्यावहारिक तरीक़ा हैं कि ढलान असल में क्या उगाती, बीनती और बनाती है, उसके मुक़ाबले जो नीचे मैदान में बिकता है।