इस तट पर प्रतिरोध को दो चीज़ें अलग करती हैं। पहली यह कि गांधीवादी तरीक़ा यहाँ सिर्फ़ बरता नहीं गया, यहीं गढ़ा गया — 1928 का बारडोली वह अभियान था जो भू-राजस्व से पूरे ज़िले भर के इनकार को सरकारी जाँच तक ले गया और जीता, और 1930 का नमक मार्च जान-बूझकर इन्हीं गाँवों से होकर दांडी के किनारे तक ले जाया गया। दूसरी यह कि आंदोलन के पास अलग-अलग माँगों वाले दो वर्ग थे। बारडोली मैदान के पाटीदार खेतिहर एक राजस्व निर्धारण से लड़ रहे थे। उनके ऊपर की ढलान के रानीपराज और हालपति समुदाय बंधुआ मज़दूरी, शराब और जंगल तक पहुँच से जूझ रहे थे, और उनका संगठन राजस्व आंदोलन से नहीं, आश्रम-शालाओं तथा बालवाड़ियों के ज़रिए हुआ। दमन, जो क्षेत्र के भीतर ही है, पुर्तगाली इलाक़ा था, और वहाँ इसमें से कुछ भी लागू नहीं था।
बारडोली सत्याग्रह12 फ़रवरी – अगस्त 1928
सूरत ज़िले के बारडोली तालुका भर में भू-राजस्व देने से पूरे ज़िले का इनकार, जब 1926 की आपदाओं के बाद निर्धारण 22 प्रतिशत बढ़ा दिया गया। वल्लभभाई पटेल ने इसे नरहरि परीख, रविशंकर व्यास और मोहनलाल पंड्या के साथ गाँव-दर-गाँव संगठित किया, और गांधी ने जान-बूझकर दूरी बनाए रखी।
परिणाम: मैक्सवेल–ब्रूमफ़ील्ड जाँच ने पाया कि उचित बढ़ोतरी लगभग 6 प्रतिशत थी। ज़ब्त की गई ज़मीन और संपत्ति लौटाई गई और बढ़ोतरी रोक दी गई। बारडोली की स्त्रियों ने पटेल को सरदार की उपाधि दी।
दांडी तक नमक मार्च12 मार्च – 6 अप्रैल 1930
गांधी साबरमती से 387 किलोमीटर चलकर 48 गाँवों और चार ज़िलों से होकर, जिनमें ज़्यादातर दक्षिण गुजरात में थे, नवसारी ज़िले में दांडी के किनारे पहुँचे और 6 अप्रैल को वहाँ समुद्र के पानी से नमक बनाया। उन्होंने 78 स्वयंसेवकों के साथ शुरुआत की थी और कई किलोमीटर लंबे क़ाफ़िले के आगे पहुँचे।
परिणाम: नमक क़ानून तोड़ना पूरे भारत में फैल गया। गांधी 4–5 मई 1930 की रात गिरफ़्तार कर लिए गए।
धरासणा सत्याग्रह21 मई 1930
स्वयंसेवक दांडी से लगभग चालीस किलोमीटर दक्षिण में धरासणा नमक कारख़ाने पर क़तारों में बढ़े। अब्बास तैयबजी और कस्तूरबा गांधी वहाँ पहुँचने से पहले ही गिरफ़्तार कर लिए गए, और सरोजिनी नायडू तथा अबुल कलाम आज़ाद ने कार्रवाई का नेतृत्व किया। पुलिस ने बढ़ती हुई क़तारों पर लाठियाँ चलाईं। पत्रकार वेब मिलर ने अस्पताल में दो मृत और 320 घायल गिने।
परिणाम: मिलर की रिपोर्ट दुनिया भर के लगभग 1,350 अख़बारों में छपी और संयुक्त राज्य सीनेट के अभिलेख में पढ़कर दर्ज कराई गई, जिसने इस अभियान को भारतीय नहीं, अंतरराष्ट्रीय ख़बर बना दिया।
रानीपराज रचनात्मक कार्य आंदोलन1926 से
जुगतराम दवे की रानीपराज विद्यालय, जो 1926 में बारडोली में स्थापित हुई और बाद में वेडछी ले जाई गई, ने सूरत और वलसाड़ की ढलान के रानीपराज समुदायों तथा बंधुआ हालपति मज़दूरों के बीच आश्रम-शालाएँ, बालवाड़ियाँ और कताई का काम खड़ा किया।
परिणाम: इसने वन-ढलान को राष्ट्रीय आंदोलन में उसकी अपनी शर्तों पर लाया — राजस्व के इर्द-गिर्द नहीं, ज़मीन, बंधुआगिरी और जंगल तक पहुँच के इर्द-गिर्द — और एक ऐसा संस्थागत जाल छोड़ा जो हर एक अलग अभियान से ज़्यादा जिया।