वेष्टि और तुंडुपुरुष
एक सफ़ेद सूती लपेट, जो टख़ने तक या घुटने पर मोड़कर पहनी जाती है, और कंधे पर एक पतला अंगोछा। सुनहरे किनारे वाला रूप मंदिर और विवाह में पहना जाता है, और किनारे की चौड़ाई ही औपचारिकता की निशानी है।
किस मौके पर: रोज़मर्रा और औपचारिक
नांजिल नाडु · Eastern Coastal Plains
इस इलाक़े का अपना कोई बुनाई-समूह नहीं है और उसे कभी उसकी ज़रूरत भी नहीं पड़ी — यह कसवु (kasavu) किनारे वाला सूती कपड़ा तट पर थोड़ी दूर ऊपर के करघों से ख़रीदता है और विवाह के लिए कांचीपुरम का रेशम दूसरी दिशा से, और यह ख़ुद इस बात का सबसे साफ़ बयान है कि यह कहाँ बैठा है। इसके पास जो है, वह कपड़े के इतिहास का एक निर्णायक टुकड़ा है: निचली जातियों की स्त्रियों के ऊपरी शरीर ढकने के अधिकार को लेकर चान्नार आंदोलन 1820 के दशक से इन तालुकों में चले और 1859 में त्रावणकोर की एक घोषणा से निपटे। यहाँ पहनावा आज जीवित लोगों के दादा-दादी की स्मृति के भीतर एक क़ानूनी सवाल था।
क्या पहना जाता है
एक सफ़ेद सूती लपेट, जो टख़ने तक या घुटने पर मोड़कर पहनी जाती है, और कंधे पर एक पतला अंगोछा। सुनहरे किनारे वाला रूप मंदिर और विवाह में पहना जाता है, और किनारे की चौड़ाई ही औपचारिकता की निशानी है।
किस मौके पर: रोज़मर्रा और औपचारिक
त्रावणकोर की दो-टुकड़ों वाली लपेट, जो आज भी मलयालम बोलने वाले तालुकों में और पूरे ज़िले में बड़ी उम्र की स्त्रियों द्वारा पहनी जाती है, उस साड़ी के साथ-साथ जो बाक़ी जगह रोज़ का परिधान है।
किस मौके पर: उत्सव, मंदिर, पारिवारिक अवसर
सुनहरे किनारे वाला हल्का सफ़ेद सूत, जो मंदिर उत्सवों में पहना जाता है — एक तमिल ज़िले में केरल का रंग-रूप, और उन गिनी-चुनी दृश्य निशानियों में से एक जो दोनों तरफ़ से आए आगंतुक को तुरंत पढ़ में आ जाती हैं।
किस मौके पर: कोडै, ओणम, विवाह
पानी में उतरने और बोझ ढोने के लिए छोटी बाँधी गई साड़ी, और टोकरी के लिए सिर पर एक गद्दी। तटीय गाँव लातीनी कैथलिक हैं और उनके पहनावे के तौर-तरीक़े कुछ ही किलोमीटर भीतर के गाँवों से साफ़ अलग दिखते हैं।
किस मौके पर: रोज़मर्रा, घाटों और बाज़ारों में
स्वामीतोप्पु पति और उसके शाखा-मंदिरों में पहना जाने वाला सादा सफ़ेद कपड़ा और सफ़ेद पगड़ी, जिसमें गहनों का न होना ही बात है।
किस मौके पर: पतियों और निझल तंगलों (nizhal thangal) में उपासना
बुनाई और कपड़े
यहाँ हर उत्सव में पहना जाने वाला सुनहरे किनारे का सूती कपड़ा तट पर ऊपर के त्रावणकोर हथकरघा गाँवों में बुना जाता है और नागरकोइल तथा मार्तंडम भर में बिकता है। यह इलाक़ा अपने पड़ोसी की वस्त्र-परंपरा का उपभोग करता है, उसे अपने यहाँ दोहराए बिना।
चटाइयाँ, टोकरियाँ, सूप और वे सिर की गद्दियाँ जो मछली ढोने वाले बरतते हैं, ताड़ के पत्ते और केवड़े से बुनी हुईं। बाज़ार का नहीं, घर का शिल्प, और ज़्यादातर स्त्रियाँ ही करती हैं।
गहने
नांजिल नाडु का पारंपरिक पहनावा — कपड़े, हथकरघा बुनाई, जीआई टैग वाले वस्त्र और गहने। (7)