नांजिल तमिल एक तमिल-भाषी देहात पर कई सदियों तक मलयालम में चले प्रशासन का नतीजा है, और वह ठीक उन्हीं जगहों पर दिखता है जहाँ संपर्क आम तौर पर दिखता है — नातेदारी के शब्द, घरेलू शब्दावली, खाने के नाम और जगहों के नाम — व्याकरण में नहीं। तस्वीर का दूसरा आधा हिस्सा यह है कि यहाँ मलयालम महज़ एक अधःस्तर नहीं, बल्कि पश्चिमी तालुकों में अपने स्कूलों, गिरजाघरों और अख़बारों वाली एक जीवित अल्पसंख्यक भाषा है। बोलने वाले दोनों के बीच बिना किसी को बाहरी माने आते-जाते हैं, जो यहाँ एक सामान्य स्थिति है और तमिलनाडु में और कहीं एक असामान्य।
नांजिल तमिलद्रविड़ — तमिल
एक बड़ी मलयालम शब्द-परत, एक अलग स्वराघात और ऐसी शब्दावली वाली तमिल — कसावा के लिए कप्पा, खटास देने वाले फल के लिए कुडमपुली — जिसे मदुरै के किसी बोलने वाले को समझाना पड़ेगा। इस ज़िले के तमिल लेखक छपे हुए में इसी से पहचाने जाते हैं।
बोलने वाले: पूरे ज़िले में
कन्याकुमारी की मलयालमद्रविड़ — मलयालम
मलयालम माध्यम की पढ़ाई और गिरजाघर में उसके बरताव वाला एक मान्यता-प्राप्त भाषाई अल्पसंख्यक, जो घाटों के पार बोली जाने वाली मलयालम का कोई अलग द्वीप नहीं बल्कि उसी का निरंतर विस्तार है।
बोलने वाले: पश्चिमी तालुक, ख़ासकर विलवनकोड और कल्कुलम
तटीय गिरजा-क्षेत्रों की तमिलद्रविड़ — तमिल
मछली पकड़ने और नौवहन की अपनी शब्दावली, उत्तर के तट के साथ साझा पुर्तगाली से बने रोज़ के शब्दों का एक भंडार — खिड़की के लिए जन्नल, मेज़ के लिए मेसै, अलमारी के लिए अलमारि, प्याले के लिए कोप्पै — और उन्हीं से आए नाम तथा कुल-नाम।
बोलने वाले: कोलाचल से मानकुडि तक के लातीनी कैथलिक मछुआरा गाँव