इस इलाके में ब्रिटिश भारत का कोई ज़िला था ही नहीं — जोधपुर, बीकानेर और जैसलमेर देशी रियासतें थीं, और औपनिवेशिक उपस्थिति प्रशासन नहीं, एक रेजीडेंसी थी। इसलिए प्रतिरोध ने दो ऐसे रूप लिए जिनका आपस में लगभग कोई नाता नहीं था। 1857 में यह जागीरदारों का विद्रोह था, जो आउवा में जोधपुर दरबार और कंपनी दोनों के ख़िलाफ़ लड़ा गया, और जिसका अंत जागीर के ध्वस्त कर दिए जाने में हुआ। संगठित राजनीति आठ दशक बाद आई और उसका निशाना ख़ुद दरबार था: उत्तरदायी शासन माँगते प्रजा मंडल (praja mandal) संगठन, और जागीरदारी लेवियों से राहत माँगता एक किसान आंदोलन। दूसरे दौर की सबसे गंभीर हिंसा, 1947 में डाबड़ा में, किसानों और जागीरदारों के बीच हुई, और रियासत ने हथियारबंद पक्ष के बजाय घायलों पर मुक़दमा चलाया।
आउवा का विद्रोह1857–58
21 अगस्त 1857 को जोधपुर लीजन के एरिनपुरा में बग़ावत करने के बाद आउवा के ठाकुर कुशाल सिंह ने विद्रोहियों को शरण दी और जोधपुर राज्य की सेना के ख़िलाफ़ बिठौड़ा में और फिर चेलावास के पास लड़ाई का नेतृत्व किया, जहाँ पॉलिटिकल एजेंट कैप्टन मॉन्क मेसन मारे गए।
परिणाम: आउवा को घेरकर 1858 में ले लिया गया और जागीर ज़ब्त कर ली गई। कुशाल सिंह तब तक फ़रार रहे जब तक उन्होंने 1860 में नीमच में आत्मसमर्पण नहीं कर दिया; 1864 में उनकी मृत्यु हुई।
मारवाड़ में प्रजा मंडल आंदोलन1934–1947
जोधपुर प्रजा मंडल की स्थापना 1934 में जयनारायण व्यास और भंवरलाल सर्राफ़ ने की और 1937 तक उसे प्रतिबंधित कर दिया गया; इसके बाद 1938 में मारवाड़ लोक परिषद बनी, जिसने जानबूझकर "प्रजा" के बजाय "लोक" शब्द चुना। इसकी माँगें नागरिक स्वतंत्रताएँ और रियासत में एक प्रतिनिधि सभा थीं।
परिणाम: इसे बार-बार प्रतिबंधित किया गया और इसके नेता बार-बार जेल भेजे गए। बालमुकुंद बिस्सा की जून 1942 में भूख हड़ताल के बाद जोधपुर जेल में मृत्यु हो गई।
मारवाड़ का किसान आंदोलन और डाबड़ा1940 का दशक, जिसकी परिणति 13 मार्च 1947 में हुई
मारवाड़ लोक परिषद और मारवाड़ किसान सभा ने जागीरदारी लेवियों और बेदख़ली के ख़िलाफ़ काश्तकारों को संगठित किया। 13 मार्च 1947 को डीडवाना के पास डाबड़ा में हुई एक किसान सभा पर जागीरदारों और उनके आदमियों के एक हथियारबंद दल ने हमला किया; कई काश्तकार मारे गए।
परिणाम: रियासत ने हमलावरों के बजाय सभा में शामिल लोगों पर मुक़दमा चलाया। यह घटना व्यापक रूप से रिपोर्ट हुई और मारवाड़ में जागीरदारी व्यवस्था ख़त्म करने का सबसे मज़बूत तर्क बन गई।
बीकानेर में प्रजा परिषद की राजनीति1936–1946
बीकानेर का आंदोलन रियासत के बाहर शुरू हुआ: बीकानेर प्रजा मंडल अक्टूबर 1936 में कलकत्ता में रियासत से गए प्रवासियों ने बनाया, जिसके अध्यक्ष मघाराम वैद्य थे, और बीकानेर राज्य प्रजा परिषद जुलाई 1942 में रघुवरदयाल गोयल ने स्थापित की।
परिणाम: प्रदर्शन उत्तर की नहरी बस्तियों तक फैल गए। 1 जुलाई 1946 को रायसिंहनगर में हुई पुलिस फ़ायरिंग में बीरबल सिंह मारे गए, जो रियासत में इस आंदोलन के सबसे जाने-माने शहीद हैं।