मालवा लगभग पूरी तरह ब्रिटिश भारत नहीं था। पठार रियासतों की एक पच्चीकारी था — इंदौर, ग्वालियर के ज़िले, धार, देवास सीनियर और देवास जूनियर, रतलाम, झाबुआ, सैलाना और छोटी-छोटी रियासतों का एक बिखराव — जहाँ ब्रिटिश सत्ता सिर्फ़ रेजिडेंसियों और महू तथा नीमच की छावनियों के रूप में मौजूद थी। इससे दो नतीजे निकलते हैं, और यही इस खंड की ईमानदार शक्ल है। पहला, यहाँ 1857 बग़ावत पर उतरे किसी देहात का नहीं, छावनियों और रियासती टुकड़ियों का उठान था, और उसे रियासतों को तोड़े बिना दबा दिया गया। दूसरा, चूँकि यहाँ राजस्व या नमक का कोई आंदोलन चलाने के लिए ब्रिटिश ज़िले थे ही नहीं, इसलिए पठार ने राष्ट्रीय आंदोलन में तुलनात्मक रूप से बहुत कम नामी लोग दिए, और व्यक्तियों का दर्ज अभिलेख घटनाओं के अभिलेख से पतला है। पठार का सबसे मशहूर नाम, चंद्रशेखर आज़ाद, उसकी पश्चिमी पहाड़ी झालर पर जन्मे और उन्होंने अपना सारा काम एक हज़ार किलोमीटर दूर किया।
1857 की छावनी बग़ावतेंजून – जुलाई 1857
नीमच की बंगाल ब्रिगेड ने बग़ावत की और दिल्ली की ओर कूच किया, और 1 जुलाई को इंदौर की टुकड़ियों ने बग़ावत की। यूरोपीय अफ़सरों ने नीमच के क़िले में पनाह ली।
परिणाम: मालवा फ़ील्ड फ़ोर्स ने नीमच को छुड़ाया और 1857 तथा 1858 के दौरान पूरे पठार पर व्यवस्था बहाल की। नीमच वह सबसे दक्षिणी बिंदु था जहाँ तक बग़ावत पहुँची।
मंदसौर का उठान और नीमच का घेरा1857
विद्रोही सेनाएँ पठार की उत्तरी अफ़ीम पट्टी में मंदसौर पर इकट्ठी हुईं और नीमच के उस क़िले को घेर लिया जहाँ छावनी के अफ़सरों ने शरण ली थी।
परिणाम: 1857 में मालवा फ़ील्ड फ़ोर्स ने इसे तोड़ दिया।
धार के क़िले पर क़ब्ज़ा1857
विद्रोहियों ने धार का क़िला, यानी परमारों और सल्तनत की पुरानी गद्दी, ले लिया और उसे अक्टूबर 1857 तक अपने क़ब्ज़े में रखा।
परिणाम: बग़ावत के बाद अंग्रेज़ों ने धार रियासत को मिला लिया और 1860 में उसे आनंद राव पवार तृतीय को लौटा दिया।