मगध का उपनिवेश-विरोधी इतिहास किसी देहात का नहीं, बल्कि एक प्रांतीय राजधानी का इतिहास है। 1857 की यहाँ की घटनाएँ शहरी, छोटी और कड़ी सज़ा पाई हुई थीं: जुलाई के आरंभ में पटना में एक फाँसी, उसी महीने के आख़िर में दानापुर में सिपाहियों का विद्रोह, और उसके बाद एक पीढ़ी तक कुछ भी संगठित नहीं। जो हुआ वह क़ानूनी और संस्थागत था — वकीलों की अगुवाई वाली कांग्रेस, बिहार को बंगाल से अलग कराने का अभियान, बिहार विद्यापीठ — और उसके साथ-साथ, और अक्सर उसके ख़िलाफ़, बिहटा के एक आश्रम से संगठित वह काश्तकार आंदोलन, जो सरकार को नहीं, ज़मींदार को अपना विरोधी बताता था। इस क्षेत्र की राष्ट्रीय राजनीति का सबसे मशहूर अकेला दिन, 11 अगस्त 1942, स्कूली लड़कों ने बनाया।
जुलाई 1857 का पटना विद्रोहजुलाई 1857
जुलाई के आरंभ में शहर में एक षड्यंत्र पकड़ा गया; पीर अली ख़ान, जो जिल्दसाज़ और किताब-विक्रेता थे और जिनकी दुकान बैठकों की जगह रही थी, 4 जुलाई को दूसरों के साथ गिरफ़्तार हुए और 7 जुलाई को चौदह और लोगों के साथ सार्वजनिक रूप से फाँसी पर चढ़ा दिए गए। 25 जुलाई को पटना के पश्चिम में दानापुर में तैनात सिपाही पलटनों ने विद्रोह किया और सोन पार करके भोजपुर में चली गईं।
परिणाम: शहर ख़ुद पूरे समय क़ाबू में रहा; दानापुर की पलटनें सोन के पश्चिम के इलाके में, इस क्षेत्र के बाहर, कुँवर सिंह के अभियान से जा मिलीं।
पटना के राजद्रोह मुक़दमे1864-1871
पटना के सादिक़पुर मोहल्ले पर केंद्रित एक सुधारवादी धार्मिक जाल, जो दशकों से उत्तर-पश्चिम सरहद के एक शिविर के लिए चंदा और भर्तियाँ जुटाता रहा था, सरकार द्वारा अंबाला, पटना और अन्य जगहों पर चले मुक़दमों की एक शृंखला में अभियोजित किया गया।
परिणाम: प्रमुख लोगों को दोषी ठहराकर अंडमान भेज दिया गया; इस जाल का पटना वाला संगठन तोड़ दिया गया।
बिहार प्रांतीय किसान सभा1929 से
1929 में बना एक काश्तकार संगठन, जो बड़ी हद तक पटना ज़िले के बिहटा में स्वामी सहजानंद सरस्वती के आश्रम से चलता था और बकाश्त ज़मीन से बेदख़ली तथा लगान बढ़ाने के ख़िलाफ़ अभियान चलाता था। अप्रैल 1936 में लखनऊ में बनी अखिल भारतीय किसान सभा के लिए संगठन का ढाँचा इसी ने दिया।
परिणाम: 1937-38 का बिहार काश्तकारी संशोधन क़ानून बकाश्त आंदोलन से ही निकला; सभा ख़ुद काश्तकारी सुधार की रफ़्तार पर कांग्रेस नेतृत्व से अलग हो गई।
पटना में भारत छोड़ोअगस्त 1942
11 अगस्त 1942 को पटना में सचिवालय की इमारत पर झंडा फहराने की कोशिश करते छात्रों के जुलूस पर गोली चलाई गई और सात लोग मारे गए: उमाकांत प्रसाद सिन्हा, रामानंद सिंह, सतीश प्रसाद झा, जगतपति कुमार, देवीपद चौधरी, राजेंद्र सिंह और रामगोविंद सिंह। अगले हफ़्तों में पूरे क्षेत्र में रेल और तार की लाइनें काट दी गईं।
परिणाम: बिहार में यह आंदोलन साल के अंत तक दबा दिया गया। इन सात की स्मृति में बने स्मारक की आधारशिला उसी जगह पर 15 अगस्त 1947 को रखी गई।