यहाँ तीन अलग-अलग चीज़ें हुईं, और वे एक कहानी नहीं हैं। पहली थी ईरोड के इलाक़े में 1801–1805 का पालयक्कारर प्रतिरोध, जो शर्त और राजस्व को लेकर था और संकगिरि में ख़त्म हुआ। दूसरी थी 1920 के दशक से चला मिल-क़स्बों का राष्ट्रवाद, जो किसी भूधारी वर्ग के बजाय एक औद्योगिक कामगार वर्ग ने पैदा किया, और जनवरी 1932 का तिरुप्पूर का झंडा जुलूस उसी का हिस्सा है। तीसरा था आत्म-सम्मान आंदोलन, जिसकी स्थापना 1925 में ईरोड में एक ऐसे आदमी ने की जो तीन साल पहले प्रांतीय कांग्रेस का अध्यक्ष रह चुका था और जिसने उसे छोड़ दिया; 1947 से पहले उसका काम समाज-सुधार था — बिना पुरोहित और बिना जाति के होने वाले विवाह, विधवा पुनर्विवाह, स्त्रियों की संपत्ति और जातिगत अपात्रता का ख़ात्मा — और वह उन्हीं क़स्बों में कांग्रेस के साथ-साथ, और अक्सर उसके ख़िलाफ़, चलता रहा।
कोंगु पालयक्कारर प्रतिरोध1801–1805
1799 के अधिग्रहण के बाद कंपनी सीधे वसूली करने और पालयमों को निहत्था करने की ओर बढ़ी। ईरोड के पास ओडनिलै को थामे धीरन चिन्नमलै ने इनकार किया और चार साल तक पश्चिमी उच्चभूमि में छोटी-छोटी झड़पों की एक शृंखला लड़ी।
परिणाम: उन्हें पकड़कर 1805 में संकगिरि के क़िले में फाँसी दे दी गई; कोंगु देश में पालयम की शर्त समेट दी गई और उसे राजस्व देने वाली जागीरों के रूप में फिर से जारी किया गया।
मिल-क़स्बों के अभियान1920–1932
असहयोग और फिर सविनय अवज्ञा ने कोयंबत्तूर, तिरुप्पूर, ईरोड और सेलम में जड़ पकड़ी — किसानों के बीच नहीं, मिल मज़दूरों, बुनकरों और व्यापारियों के बीच। विदेशी कपड़े की धरनेबंदी, हड़तालें और राष्ट्रवादी झंडे पर लगी रोक की अवहेलना में निकाले जाने वाले जुलूस ही आम तरीक़े थे।
परिणाम: 11 जनवरी 1932 को तिरुप्पूर में नोय्यल के किनारे एक झंडा जुलूस तितर-बितर किया गया और झंडा थामे कुमरन अपनी चोटों से मारे गए; स्थानीय तौर पर उन्हें कोडि काता कुमरन के नाम से याद किया जाता है।
आत्म-सम्मान आंदोलन1925 से
1925 में कांग्रेस छोड़ने के बाद ई. वी. रामासामी ने इसकी स्थापना ईरोड में की, जिसका मंच कुडि अरसु पत्रिका थी और जिसका पहला प्रांतीय सम्मेलन फ़रवरी 1929 में चेंगलपट्टु में हुआ। स्वतंत्रता से पहले उसका कार्यक्रम सामाजिक था: बिना पुरोहित और बिना जातिगत विधि के होने वाले विवाह, विधवा पुनर्विवाह, अंतर्जातीय विवाह, बाल-विवाह का विरोध, और मंदिरों, कुओं तथा स्कूलों में जातिगत अपात्रता के ख़िलाफ़ अभियान।
परिणाम: 1920 के दशक के आख़िर से आत्म-सम्मान विवाह पश्चिमी ज़िलों में फैले और आंदोलन ने एक प्रेस तथा सम्मेलनों का एक जाल खड़ा किया, जो कांग्रेस से स्वतंत्र रूप से चलता था।