इस मैदान का प्रतिरोध संवैधानिक नहीं, कृषि और औद्योगिक है, और वह असामान्य रूप से पैसे पर केंद्रित है। यहाँ 1857 की घटनाएँ हफ़्तों चलीं: दिसंबर में एक ज़मींदार को फाँसी, और जनवरी में उसी क़स्बे में सिपाहियों का एक उठान। इसके बाद साठ साल तक कुछ भी संगठित नहीं होता। जब 1920 में राजनीति लौटती है तो वह भुगतान के दो झगड़ों के रास्ते लौटती है — धमतरी तहसील के एक अकेले गाँव द्वारा सिंचाई कर देने से इनकार, और राजनांदगाँव की मिल में पाँच हफ़्तों से ज़्यादा चली एक हड़ताल — और जिन लोगों ने दोनों की अगुआई की वे आगे चलकर सभाओं में बहस करने के बजाय बुनकरों, खेतिहरों और मिल मज़दूरों को संगठित करने निकले। समाज-सुधार उसके साथ-साथ और कभी-कभी उससे आगे चला: वही संगठक मैदान में मंदिर-प्रवेश और जाति-सुधार का दबाव तब बना रहे थे जब राष्ट्रीय आंदोलन ने यह सवाल उठाया भी नहीं था।
सोनाखान का उठान1856–1857
सोनाखान के ज़मींदार नारायण सिंह ने 1856 के अकाल के दौरान एक व्यापारी का अनाज-गोदाम तोड़कर अनाज बाँट दिया। गिरफ़्तार होकर रायपुर में क़ैद रहे, 1857 में भाग निकले और मैदान के पूर्व के जंगली इलाक़े में लगभग पाँच सौ आदमियों की एक टुकड़ी खड़ी की।
परिणाम: कैप्टन स्मिथ के नेतृत्व वाली कंपनी की एक टुकड़ी ने उन्हें पकड़ लिया; 10 दिसंबर 1857 को रायपुर में उन्हें फाँसी दी गई और सोनाखान की जागीर ज़ब्त कर ली गई।
रायपुर का सिपाही उठानजनवरी 1858
रायपुर में तैनात रेजिमेंट के सिपाही सोनाखान की फाँसी के कुछ ही हफ़्तों बाद हनुमान सिंह के नेतृत्व में उठ खड़े हुए।
परिणाम: उठान कुछ ही दिनों में कुचल दिया गया। मुक़दमा चलाए गए लोगों में से सत्रह को 22 जनवरी 1858 को रायपुर में फाँसी दी गई, और छावनी का पुनर्गठन कर दिया गया।
कंडेल नहर सत्याग्रह1920
धमतरी तहसील के कंडेल गाँव ने नहर की सिंचाई के लिए लगाया गया वह कर देने से इनकार कर दिया जिसके बारे में गाँव वालों का कहना था कि उन्होंने उसका इस्तेमाल ही नहीं किया। सुंदरलाल शर्मा ने इस इनकार को संगठित किया और वह आसपास के गाँवों में फैल गया; इसी सिलसिले में गांधी दिसंबर 1920 में रायपुर आए।
परिणाम: टकराव के चरम पर पहुँचने से पहले ही माँग छोड़ दी गई, और यही वजह है कि इस प्रसंग को मैदान में मध्य भारत की पहली सफल असहयोग कार्रवाई के रूप में याद किया जाता है।
राजनांदगाँव की मिल हड़ताल1920
राजनांदगाँव की सूती मिल के मज़दूरों ने काम के घंटों और हालात को लेकर सैंतीस दिनों से ज़्यादा हड़ताल की, जिसे ठाकुर प्यारेलाल सिंह ने संगठित किया था।
परिणाम: काम के घंटे घटाए गए। यह हड़ताल मध्य भारत की सबसे आरंभिक लंबी औद्योगिक कार्रवाइयों में है और उसने मैदान को उसके कांग्रेस संगठन से एक दशक पहले एक मज़दूर संगठन दे दिया।