कन्नड़ देश में सशस्त्र प्रतिरोध का सबसे लंबा ब्योरा इसी मैदान का है, और उसका लगभग पूरा हिस्सा राष्ट्रीय आंदोलन से एक पीढ़ी या उससे भी पहले का है। वह देसाई घरानों और उनके हथियारबंद अनुचरों ने लड़ा, गोद लेने और उत्तराधिकार को लेकर, ज़ब्त की गई ज़मीन को लेकर और उन आदेशों को लेकर जो गाँवों से हथियार छोड़ने की माँग करते थे — किसी राष्ट्रीय बात को लेकर नहीं। 1824 का कित्तूर, संगोल्लि रायण्णा का 1829–30 का अभियान, और सुपा, बागलकोट, नरगुंद तथा दांडेलि के 1857–58 के विद्रोहों का गुच्छा, यही क्रम है। कांग्रेस की राजनीति बाद में आई, पर यहाँ जल्दी आई, और दिसंबर 1924 में वह अकेला कांग्रेस अधिवेशन, जिसकी अध्यक्षता गांधी ने की, बेलगावि के लिए चुना गया।
कित्तूर विद्रोहअक्टूबर – दिसंबर 1824
जब रानी चेन्नम्मा के गोद लिए उत्तराधिकारी को मान्यता देने से इनकार कर दिया गया, तो ईस्ट इंडिया कंपनी कित्तूर पर चढ़ आई। अक्टूबर की लड़ाई में कलेक्टर सेंट जॉन थैकरे मारे गए, और विवरणों में अमटूर बलप्प का नाम आता है; दिसंबर में हुए दूसरे हमले ने, जिसमें उप-कलेक्टर मुनरो भी मारे गए, क़िला ले लिया।
परिणाम: चेन्नम्मा को बैलहोंगल में क़ैद किया गया और 21 फ़रवरी 1829 को वहीं उनकी मृत्यु हुई। कित्तूर हड़प नीति के औपचारिक रूप से कहे जाने से बीस साल से ज़्यादा पहले ले लिया गया था।
संगोल्लि रायण्णा का अभियान1829–1830
कित्तूर के वरिष्ठ सेनापति ने, अपनी ही ज़मीनें ज़ब्त होने पर, किसानों को खड़ा किया और कंपनी की प्रशासनिक इमारतों, सेनाओं तथा ख़ज़ानों के ख़िलाफ़ एक चलता-फिरता अभियान लड़ा, जिसका ख़र्च वसूली और पकड़ी गई नक़दी से चलाया, और जिसमें सिद्दी सरदार गजवीर का साथ मिला।
परिणाम: उन्हें अप्रैल 1830 में शिवलिंगप्प के साथ पकड़ लिया गया, जिन्हें वे कित्तूर पर बिठाना चाहते थे, और 26 जनवरी 1831 को नंदगड के पास एक बरगद के पेड़ से फाँसी दे दी गई।
1857–58 के विद्रोह1857–1858
सुपा, बागलकोट, नरगुंद और दांडेलि में विद्रोह, और हलगलि के बेडों का निरस्त्रीकरण नियम के तहत अपने हथियार सौंपने से इनकार। नरगुंद के भास्कर राव भावे ने कोप्पलदुर्ग का क़िला लिया; मुंडरगि भीमराव और हम्मिगे केंचनगौड उनके साथ लड़े।
परिणाम: सब दबा दिए गए। भीमराव और केंचनगौड जून 1858 में कोप्पल में मारे गए और नरगुंद उसी साल गिरा।
कर्नाटक ज़िलों में भारत छोड़ो की कार्रवाइयाँ1942–1943
अगस्त 1942 के बाद बंबई कर्नाटक ज़िलों भर में कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने राजस्व अभिलेखों, ख़ज़ानों और संचार पर हमले किए। 1 अप्रैल 1943 को हावेरि के होसरिट्टि में एक समूह ने गाँव के मंदिर में रखा भू-राजस्व तोड़कर निकाला और उसे उन किसानों को लौटाना शुरू किया जिनसे वह लिया गया था।
परिणाम: होसरिट्टि में पुलिस ने गोली चलाई; मैलार महादेवप्प, तिरकप्प मडिवालर और वीरय्य हिरेमठ मारे गए।