बघेलखंड रियासती इलाका था, और यही बात सब कुछ तय करती है। रीवा का न विलय हुआ और न वह हड़प नीति में गया; 1857 में उसके महाराजा ने अंग्रेज़ों की मदद के लिए सेना भेजी, और इस पठार पर लड़ाई राजधानी से नहीं, उसके छोरों पर अलग-अलग ठाकुरों के नेतृत्व में हुई। कांग्रेस रियासतों के भीतर खुलकर संगठन नहीं कर सकती थी, इसलिए बीसवीं सदी ने यहाँ कोई जन-उपनिवेशवाद-विरोधी आंदोलन नहीं, बल्कि प्रजा मंडल की हलचल पैदा की — यानी रियासत की प्रजा का अपने ही दरबार से प्रतिनिधि शासन की माँग करना — और वह भी 1940 के दशक के मध्य में ही कुछ ठोस बन पाई। इसी हिसाब से अलग-अलग व्यक्तियों का दस्तावेज़ी अभिलेख पतला है, आसपास के किसी भी क्षेत्र से ज़्यादा पतला, और स्थानीय स्तर पर याद की जाने वाली कई शख़्सियतें समकालीन स्रोतों में खोजी नहीं जा सकतीं। आगे जो है वह भरा-पूरा करने के बजाय जान-बूझकर छोटा रखा गया है।
रीवा–बाँदा सीमा का विद्रोह1857–59
जब रीवा दरबार अंग्रेज़ों का साथ दे रहा था, तब रियासत की उत्तरी सीमा पर, जहाँ पठार बाँदा और इलाहाबाद की ओर सीढ़ी-दर-सीढ़ी उतरता है, ठाकुरों ने हथियार उठाए और क़रीब दो साल तक ऊबड़-खाबड़ इलाके को थामे रखा। नेता के तौर पर सबसे ज़्यादा नाम ठाकुर रणमत सिंह का लिया जाता है।
परिणाम: दबा दिया गया; रणमत सिंह 1859 में पकड़े गए और उन्हें फाँसी दी गई।
बिजयराघोगढ़ का विद्रोह1857–58
पठार के दक्षिण-पश्चिमी छोर पर बिजयराघोगढ़ के एक नौजवान ठाकुर सुरजू प्रसाद अक्टूबर 1857 के आख़िर में उठ खड़े हुए, क़रीब तीन हज़ार की सेना जुटाई और ज़िले से गुज़रने वाली सड़क तथा डाक-संचार काट दिए।
परिणाम: जनवरी 1858 में उनका क़िला ले लिया गया और ढहा दिया गया। वे बच निकले, 1864 तक फ़रार रहे, आजीवन कालापानी की सज़ा पाई, और 1865 में जबलपुर में क़ैद में उनकी मृत्यु हुई।
प्रजा मंडल की हलचल1930 का दशक–1947
रीवा और छोटी रियासतों भर में रियासती प्रजा के संगठनों ने दरबारों के भीतर नागरिक स्वतंत्रताओं और प्रतिनिधि शासन की माँग रखी। रीवा राज्य प्रजा मंडल इनमें सबसे बड़ा था; उसके संगठनकर्ता बार-बार जेल भेजे गए और रियासत से निकाले गए।
परिणाम: प्रतिनिधि संस्थाएँ 1948 में रियासतों के विलय के साथ ही आईं।