सौराष्ट्र की स्थिति असामान्य है: उसने राष्ट्रीय आंदोलन को जितना नेतृत्व दिया, आंदोलन ख़ुद उससे कहीं कम उसकी ज़मीन पर चला। प्रायद्वीप में ब्रिटिश भारतीय भूभाग लगभग था ही नहीं — वह एक एजेंसी के अधीन कई सौ रियासतें थीं — इसलिए स्थानीय लड़ाई दरबारों से थी, कराधान, सभा और अभिव्यक्ति को लेकर, और उसने 1921 से आगे प्रजा मंडल का रूप लिया, पहले भावनगर में और सबसे दिखने वाले रूप में 1938–39 में राजकोट में। उसके समांतर एक पुराना और बिलकुल अलग सशस्त्र प्रतिरोध चलता है, उन्नीसवीं सदी के मध्य में ओखामंडल का वाघेर विद्रोह, और एक प्रवासी धारा भी: एक काठियावाड़ी ज़मींदार 1905 में लंदन की इंडियन होम रूल सोसाइटी और पैरिस इंडियन सोसाइटी, दोनों के संस्थापकों में था। और प्रायद्वीप का सबसे बड़ा योगदान उसे छोड़ ही गया: गांधी 1869 में पोरबंदर में जन्मे और उन्होंने अपना राजनीतिक काम यहाँ के सिवा हर जगह किया।
ओखामंडल में वाघेर विद्रोहउन्नीसवीं सदी का मध्य
बेट द्वारका के मंदिर-क़स्बे पर बमबारी के बाद ओखा तट की वाघेर बिरादरियाँ ईस्ट इंडिया कंपनी और गायकवाड़ की सत्ता के ख़िलाफ़ उठ खड़ी हुईं, जोधा माणेक के नेतृत्व में कोडीनार लिया, और उनका पीछा बरडा की पहाड़ियों में अभपरा चोटी पर आख़िरी मोर्चे तक किया गया।
परिणाम: विद्रोह दबा दिया गया और उसके बाद ओखामंडल बड़ौदा रियासत को हस्तांतरित कर दिया गया। मुख्य चरण के सटीक वर्षों को लेकर विवरण अलग-अलग हैं, और कोई एक कालक्रम सर्वस्वीकृत नहीं है।
काठियावाड़ रियासतों में प्रजा मंडल आंदोलन1921–1947
उत्तरदायी शासन, नागरिक स्वतंत्रताओं और रियासती वसूलियों से राहत की माँग करने वाले संगठन प्रायद्वीप की बड़ी रियासतों में बने, जिनकी शुरुआत 1921 में बलवंतराय मेहता के स्थापित भावनगर प्रजा मंडल से हुई।
परिणाम: सविनय अवज्ञा के वर्षों में और फिर 1942 के बाद नेताओं को बार-बार क़ैद किया गया। फ़रवरी 1948 में रियासतें एक ही प्रशासन में मिला दी गईं।
राजकोट सत्याग्रह1938–1939
राजकोट रियासत में भारी कराधान के ख़िलाफ़ और अभिव्यक्ति, सभा तथा शिक्षा और कल्याण सेवाओं तक पहुँच पर लगी पाबंदियों के ख़िलाफ़ एक आंदोलन, जिसका नेतृत्व यू. एन. ढेबर ने किया और जिसने काठियावाड़ रियासतों के व्यापक जन-आंदोलन को अपने भीतर खींच लिया।
परिणाम: ढेबर 1938–39 में क़ैद हुए, और फिर 1941 में तथा 1942 से 1945 तक। अगले दशक के लिए राजकोट प्रायद्वीप की राजनीति का केंद्र बन गया।