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बुंदेलखंड · Central Highlands & Forest Belt

पहनावा और वस्त्र

बुंदेलखंड बुनकरी का क्षेत्र नहीं है — धातु और पत्थर के काम जैसी कोई अपनी करघा-परंपरा उसके पास नहीं है — इसलिए यहाँ पहनावा इस बारे में है कि कपड़ा पहना कैसे जाता है, न कि बनाया कैसे जाता है। पहचान की चीज़ें हैं बुंदेली साफ़ा, जो राजस्थानी पगड़ी से ज़्यादा चपटा और चौड़ा बाँधा जाता है, और कछोरा, यानी काम की वह धोती जो टाँगों के बीच से खींचकर पीछे खोंस ली जाती है — खेत या तालाब के बंधे पर चलने के लिए मर्द यही पहनता है।

क्या पहना जाता है

कछोरा बाँधी हुई धोतीपुरुष

धोती की पिछली चुन्नट टाँगों के बीच से खींचकर पीछे कमर में खोंस दी जाती है, जिससे एक लपेटा हुआ कपड़ा काम की पतलून बन जाता है। इसके साथ बंडी — एक छोटी बिन बाँह की जैकेट — और गमछा पहना जाता है।

किस मौके पर: रोज़मर्रा और खेत का काम

बुंदेली साफ़ापुरुष

नीचा और चौड़ा बाँधा जाने वाला साफ़ा, जिसके एक तरफ़ चपटा पंखा निकलता है, केसरिया, लाल या सफ़ेद रंग में। रंग और बाँधने का ढंग, दोनों किसी भी स्थानीय आदमी के लिए समुदाय और अवसर के संकेत की तरह पढ़े जाते हैं।

किस मौके पर: शादियाँ, मेले, आल्हा की महफ़िलें

लहँगा, अँगिया और ओढ़नीस्त्रियाँ

छपे सूती कपड़े में टख़नों तक का चुन्नटदार घाघरा, कसी हुई चोली और सिर तथा कंधे ढकने वाला लंबा कपड़ा। बड़े-बुज़ुर्गों के सामने ओढ़नी सिर पर खींच ली जाती है, और सामाजिक काम यही कपड़ा करता है।

किस मौके पर: रोज़मर्रा, देहाती

राई की पोशाकबेड़नी नर्तकियाँ

भारी, पूरा घेरदार लहँगा जो नर्तकी के घूमने पर फैल जाता है, घुँघरुओं के साथ, और नीचे कसी हुई चोली। घाघरे का वज़न काम का है — वही तेज़ रफ़्तार पर घुमाव का आकार सँभालता है।

किस मौके पर: राई का प्रदर्शन

बुंदेली ढंग से पहनी गई साड़ीस्त्रियाँ

पल्लू दाहिने कंधे पर लाकर कमर में खोंस लिया जाता है, लटकता हुआ नहीं छोड़ा जाता, ताकि काम के लिए दोनों हाथ खुले रहें।

किस मौके पर: रोज़मर्रा और त्योहार

बुनाई और कपड़े

छतरपुर और मऊ (बाँदा) का हथकरघा सूती कपड़ाछतरपुर, बाँदा

बचे हुए छोटे सूती बुनाई-समूह, जो स्थानीय इस्तेमाल के लिए सादा और चारख़ाने वाला थान, गमछे और चादरें बनाते हैं। साधारण काम, जिसका कोई संरक्षित नाम नहीं, और जो सिकुड़ता जा रहा है।

बुंदेली ठप्पा-छपाई का सूती कपड़ाछतरपुर, टीकमगढ़

मोटे सूती कपड़े पर लाल, काले और नील रंग में हाथ की ठप्पा-छपाई, ओढ़नियों और घाघरों के लिए, जो ऐतिहासिक रूप से किसी दरबार को नहीं बल्कि गाँव के बाज़ारों को माल देती थी। आज बुंदेली छपाई के नाम पर जो बहुत कुछ बिकता है, वह मिल में छपा होता है।

गहने

हँसुली — गले का कड़ा चाँदी का हारकरधनी, चाँदी की कमरज़ंजीरपैजन और कड़ा, भारी चाँदी के पायलमाथे पर पहने जाने वाले बेंदी और बोरलानथिया, और ढेर में पहनी जाने वाली लाख तथा काँच की चूड़ियाँ

बुंदेलखंड का पारंपरिक पहनावा — कपड़े, हथकरघा बुनाई, जीआई टैग वाले वस्त्र और गहने। (7)