संगठित भारतीय राजनीति सबसे पहले डेल्टा में ही जोड़ी गई - 1876 में इंडियन एसोसिएशन, अख़बार और कॉलेजों का जाल, 1905 में पहला आधुनिक जन-आंदोलन - इसलिए राष्ट्रीय कथा और क्षेत्रीय कथा यहाँ इस पूरी परियोजना में कहीं और से ज़्यादा एक-दूसरे पर चढ़ जाती हैं। दो चीज़ें अलग करके देखने लायक़ हैं। पहली, डेल्टा के अपने विद्रोह इन सबसे एक सदी पहले हुए और कृषि-मूलक थे: अठारहवीं सदी के अंत का संन्यासी और फ़क़ीर प्रतिरोध, और 1859-60 का नील-इनकार, जो किसी राजनीतिक संगठन ने नहीं, खेतिहरों ने अपनी मेहनत रोककर जीता। दूसरी, इस क्षेत्र ने 1905 के बाद दो अलग और अकसर एक-दूसरे के ख़िलाफ़ खड़ी धाराएँ पैदा कीं - एक संवैधानिक और फिर गांधीवादी कांग्रेस, और क्रांतिकारी समितियाँ - और अकसर एक ही परिवार में दोनों मौजूद रहते थे।
संन्यासी और फ़क़ीर प्रतिरोधलगभग 1763-1800
हिंदू और मुसलमान घुमंतू तपस्वियों के जत्थे, जो लंबे समय से तीर्थ और व्यापार के रास्तों पर बंगाल में आते-जाते थे, 1769-70 के अकाल के आसपास और उसके बाद के वर्षों में उत्तरी तथा पश्चिमी डेल्टा भर में कंपनी की राजस्व और सैनिक टुकड़ियों से बार-बार सशस्त्र टकराव में आए।
परिणाम: सदी के अंत तक उन्हें क़ाबू कर लिया गया। यह प्रसंग बांग्ला साहित्य में बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय के उपन्यास आनंदमठ के ज़रिए आया, जो 1882 में छपा और जिसने अपना परिवेश इसी से लिया।
नील विद्रोह1859-1860
मार्च 1859 में कृष्णनगर के पास चौगाछा से दिगंबर विश्वास और विष्णुचरण विश्वास के नेतृत्व में शुरू होकर, नदिया, मुर्शिदाबाद और पूर्वी ज़िलों के खेतिहरों ने अपनी ज़मीन पर नील बोने से इनकार कर दिया। यह इनकार सामूहिक और काफ़ी हद तक अहिंसक था, और वह उससे तेज़ फैला जितनी तेज़ी से बागान-मालिक मुक़दमे कर सकते थे।
परिणाम: 1860 में एक नील आयोग नियुक्त हुआ; उसी साल दीनबंधु मित्र का नील दर्पण छपा, और उसके अंग्रेज़ी अनुवाद के प्रकाशक जेम्स लॉन्ग पर मुक़दमा चला और उन्हें जेल हुई। 1862 के नील अधिनियम ने ज़बरदस्ती की खेती ख़त्म की।
बंग-भंग विरोधी और स्वदेशी आंदोलन1905-1908
16 अक्टूबर 1905 से लागू बंगाल के विभाजन का जवाब ब्रिटिश माल के बहिष्कार, स्वदेशी उद्यमों तथा विद्यालयों की स्थापना, और सार्वजनिक जुलूसों तथा गीतों से दिया गया। उस दिन को उपवास रखकर और पूरे सूबे में एक-दूसरे को राखी बाँधकर मनाया गया।
परिणाम: 1911 में विभाजन रद्द हो गया। इस आंदोलन ने कांग्रेस को उसकी पहली जन-तकनीक दी और वे क्रांतिकारी समितियाँ भी - अनुशीलन और युगांतर - जो अगले चार दशक सक्रिय रहीं।
राइटर्स बिल्डिंग की कार्रवाई8 दिसंबर 1930
बंगाल वॉलंटियर्स के विनय बसु, बादल गुप्त और दिनेश गुप्त यूरोपीय पोशाक में कलकत्ता के राइटर्स बिल्डिंग में घुसे और कारागार महानिरीक्षक कर्नल एन. एस. सिम्पसन को गोली मारी, फिर गलियारे में गोलियों की लड़ाई लड़ी।
परिणाम: बादल गुप्त ने इमारत के भीतर ही ज़हर खाकर जान दे दी; विनय बसु 13 दिसंबर 1930 को अपने घावों से चल बसे; दिनेश गुप्त पर मुक़दमा चला और 7 जुलाई 1931 को अलीपुर जेल में उन्हें फाँसी दे दी गई।