इस मैदान का स्वतंत्रता-संघर्ष बहुत हद तक 1857 की और उसके बाद जो किया गया उसकी कहानी है। इस पर बसी लगभग हर इकाई ने उसमें हिस्सा लिया — अंबाला की छावनी, गुड़गाँव, रोहतक और हिसार के ज़िले, मेवात की जेबें, रेवाड़ी के आसपास का अहीरवाल, और झज्जर, बल्लभगढ़, फ़र्रुख़नगर तथा बहादुरगढ़ की छोटी रियासतें — और बदला पूरा लिया गया। शासकों पर सैनिक आयोग ने मुक़दमे चलाए और उन्हें दिल्ली में फाँसी दी गई, जागीरें ज़ब्त हुईं, और 1858 में पूरा भूभाग दंड के तौर पर उत्तर-पश्चिमी प्रांत से अलग करके पंजाब में जोड़ दिया गया, यही वजह है कि अगली एक सदी यह मैदान लाहौर से शासित रहा। इसके बाद जो आया वह मुख्य रूप से राष्ट्रवादी नहीं था। असहयोग यहाँ अक्टूबर 1920 में भिवानी के एक बहुत बड़े सम्मेलन के रास्ते पहुँचा और उसने ज़िलों में एक असली संगठन तथा कुछ लंबी सज़ाएँ काटने वाले क़ैदी पैदा किए; पर 1930 के दशक की यहाँ की प्रमुख ग्रामीण राजनीति यूनियनिस्ट थी, जो आज़ादी पर नहीं, क़र्ज़, ज़मीन और अनाज के दाम पर टिकी थी, और उसे नए सिरे से गढ़ने के बजाय यही कह देना ठीक है।
बांगर में 1857 का विद्रोहमई – नवंबर 1857
60वीं और 5वीं नेटिव इन्फ़ैंट्री 10 मई 1857 को अंबाला में उठ खड़ी हुईं, उसी दिन जिस दिन मेरठ में। तीन हफ़्तों के भीतर गुड़गाँव और हिसार के कलेक्ट्रेट रौंदे जा चुके थे, रोहतक में दफ़्तरी रिकॉर्ड जला दिए गए थे, मेवात का इलाका सदरुद्दीन के नेतृत्व में मेव टुकड़ियों ने ले लिया था, और झज्जर, बल्लभगढ़ तथा फ़र्रुख़नगर भी साथ आ चुके थे। पानीपत और थानेसर के गाँवों ने लगान देने से इनकार किया और दिल्ली को आदमी भेजे।
परिणाम: सितंबर 1857 में दिल्ली के पतन के साथ इसे कुचल दिया गया। अंबाला में क़रीब एक सौ बीस सिपाहियों को फाँसी दी गई; बल्लभगढ़, झज्जर और फ़र्रुख़नगर के शासकों को दिल्ली में फाँसी दी गई और उनकी जागीरें ज़ब्त कर ली गईं; और 1858 में यह भूभाग पंजाब को सौंप दिया गया।
अहीरवाल का अभियान और नसीबपुर17 मई – 16 नवंबर 1857
राव तुलाराम और उनके चचेरे भाई राव गोपाल देव ने 17 मई 1857 को रेवाड़ी के तहसीलदार को हटाया और छह महीने तक अहीरवाल थामे रखा, क़रीब पाँच हज़ार आदमी खड़े किए, बारूद और गोले बनाए, और दिल्ली की सेनाओं को धन तथा रसद भेजते रहे। दिल्ली के पतन के बाद एक ब्रिटिश टुकड़ी दक्षिण की ओर बढ़ी और 16 नवंबर 1857 को नारनौल के बाहर नसीबपुर पर उनसे भिड़ी।
परिणाम: पहले ही हमले ने ब्रिटिश पंक्ति तोड़ दी और उनके कई अफ़सर मारे गए, पर दिन ढलते-ढलते अहीरवाल की सेना हार गई। राव तुलाराम राजपूताना की ओर हटे और फिर मदद की तलाश में ईरान और अफ़ग़ानिस्तान गए; 1863 में काबुल में उनकी मृत्यु हुई।
असहयोग और भिवानी सम्मेलन1920–1922
अंबाला मंडल का राजनीतिक सम्मेलन 22 अक्टूबर 1920 को भिवानी में एक बहुत बड़े जमावड़े के सामने हुआ और उसे गांधी तथा अबुल कलाम आज़ाद ने संबोधित किया। यही वह क्षण है जब संगठित राष्ट्रवादी राजनीति इस मैदान तक पहुँची, और रोहतक, हिसार तथा गुड़गाँव में ज़िला समितियाँ इसी से बनीं।
परिणाम: ज़िलों में कांग्रेस का संगठन खड़ा हुआ और 1922 में आंदोलन ख़त्म होने के बाद भी बना रहा; नेकीराम शर्मा और अन्य लोग 1921 में और उसके बाद बार-बार जेल गए।