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हाड़ौती · Arid Northwest

पहनावा और वस्त्र

भारतीय पहनावे में इस क्षेत्र की देन कोई काट नहीं, एक बुनावट है। कोटा डोरिया 44 °C में पहने जाने के लिए बना है: सूत और रेशम की खुली चौकोर चौख़ाने वाली ज़मीन, इतनी हलकी कि पूरी साड़ी मुट्ठी में समा जाए, और इतनी खुली कि उसमें से हवा आर-पार निकले। बाक़ी सब कुछ — देहात का घाघरा, कांचली और ओढ़नी, मर्दों की धोती, अंगरखी और साफ़ा — व्यापक राजस्थानी अलमारी का हिस्सा है, और यहाँ उसकी पहचान मुख्यतः पगड़ी बाँधने के ढंग से होती है, जो बूँदी, कोटा और झालावाड़ की तरफ़ पहचानने लायक़ ढंग से बदलता है।

क्या पहना जाता है

कोटा डोरिया साड़ीऔरतें

खात चौख़ाने में बुनी एक झीनी सूती-रेशमी साड़ी, जो सादी, ठप्पा-छपी या ज़री की किनारी के साथ पहनी जाती है। भारहीन और लगभग पारदर्शी, और पठार की गर्मी में यही उसकी पूरी बात है, और अब वह गरम मौसम की साड़ी के तौर पर पूरे भारत में बिकती है।

किस मौके पर: गर्मियाँ, रोज़मर्रा और औपचारिक

घाघरा, कांचली और ओढ़नीऔरतें, देहाती

चुन्नटदार घाघरा, छोटी कसी हुई कांचली और सिर तथा कंधों पर लंबा कपड़ा। हाड़ौती की ओढ़नी आमतौर पर छपा हुआ सूती कपड़ा होती है, न कि वह लहरिया और बंधेज जो अरावली के पश्चिम में छाया हुआ है।

किस मौके पर: रोज़मर्रा और त्योहार

धोती, अंगरखी और साफ़ामर्द

धोती के ऊपर बग़ल से बँधने वाली अंगरखी, और स्थानीय तौर पर पहचान में आने वाले ढंग से बँधी पगड़ी। हाड़ा रियासतों का दरबारी पहनावा उन लंबे, ज़्यादा घेरदार अंगरखों तक जाता था जिन्हें कोटा के चित्रकारों ने बारीकी से दर्ज किया।

किस मौके पर: रोज़मर्रा और अनुष्ठान

खेतिहर पट्टी का पंचा और पगड़ीमर्द, देहाती

खेत के काम के लिए पहनी जाने वाली छोटी धोती, और छाँव के लिए ढीली लपेटी गई सूती पगड़ी — काम वाला रूप, जिसे दिन में कई बार दोबारा बाँधा जाता है।

किस मौके पर: रोज़मर्रा

सहरिया पहनावासहरिया मर्द और औरतें

सादा सूती कपड़ा — मर्दों के लिए छोटी धोती और एक कपड़ा, औरतों के लिए लुगड़ा और छोटी चोली, और गले तथा टख़नों पर चाँदी या सफ़ेद धातु। पठारी पहनावे से यह अपनी काट से नहीं, अपने सादेपन से अलग पहचाना जाता है।

किस मौके पर: रोज़मर्रा

बुनाई और कपड़े

कोटा डोरियाजीआई टैगकोटा (कैथून, कोटसुवां, मंडाना, सांगोद), और बूँदी तथा बारां में भी बुनकर

सूत और रेशम की एक खुली बुनावट, जिसकी इकाई खात है — चौदह धागों का एक चौकोर चौख़ाना, आठ सूत के और छह रेशम के, दोनों दिशाओं में दोहराया हुआ। भौगोलिक संकेतक के तौर पर पंजीकृत, जिसका स्वामित्व कोटा डोरिया डेवलपमेंट हाड़ौती फ़ाउंडेशन के पास है।

मसूरियाजीआई टैगकोटा

उसी कपड़े का पुराना नाम, और उसके उद्गम का अभिलेख: कहा जाता है कि बुनकरों को सत्रहवीं सदी में दक्कन से कोटा लाया गया था, और कपड़े ने कोटा का नाम धारण करने से बहुत पहले मैसूर का नाम ढोया।

छपा हुआ लुगड़ा और ओढ़नीकोटा, बूँदी, झालावाड़

गहरे रंग की ज़मीन पर छोटे दोहराए जाने वाले बूटों वाला रोज़मर्रा का ठप्पा-छपा सूती कपड़ा, जो देहात में सिर के कपड़े की तरह पहना जाता है। अब वह बढ़ते हुए स्क्रीन से छपने लगा है और स्थानीय छपाई के बजाय मिलों से ख़रीदा जाता है।

गहने

राखड़ी या बोर — माथे की टिकुलीतिमणिया — गले से सटा हारहँसली — चाँदी का कड़ा गले का छल्लाबाजूबंद और कड़ाआड़चाँदी की पायल और बिछिया

हाड़ौती का पारंपरिक पहनावा — कपड़े, हथकरघा बुनाई, जीआई टैग वाले वस्त्र और गहने। (8)