मिथिला की उपनिवेश-विरोधी राजनीति को इस तथ्य के साथ रखकर पढ़ना पड़ता है कि क्षेत्र का ज़्यादातर हिस्सा एक ही विशाल ज़मींदारी थी। दरभंगा राज औपनिवेशिक व्यवस्था के भीतर बैठा था - विधान परिषद, नाइटहुड, रेलवे रियायत - और साथ ही शुरुआती कांग्रेस को पैसा देने में मदद करता था, इसलिए इस क्षेत्र ने आंदोलन पैदा करने से पहले संरक्षण पैदा किया। तीखे टकराव खेती से जुड़े थे: तिरहुत के ज़िलों में नील, और बाक़ी हर जगह लगान। संगठित राष्ट्रवादी गतिविधि दरभंगा से नहीं, मुज़फ़्फ़रपुर और बेगूसराय से होकर पहुँची, और जिन दो कार्रवाइयों के लिए यह क्षेत्र सबसे ज़्यादा जाना जाता है, उन्हें उन नौजवानों ने अंजाम दिया जो बंगाल से आए थे। जन-चरण 1942 था, और वह देहाती था।
मुज़फ़्फ़रपुर बम कांड और उसके बाद का घटनाक्रम30 अप्रैल 1908
ख़ुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी, जिन्हें मजिस्ट्रेट डगलस किंग्सफ़ोर्ड को मारने के लिए बंगाल से भेजा गया था, ने मुज़फ़्फ़रपुर क्लब के बाहर एक बग्घी पर बम फेंका। किंग्सफ़ोर्ड उसमें नहीं था; दो अंग्रेज़ महिलाएँ, श्रीमती और कुमारी केनेडी, मारी गईं। चाकी की मृत्यु पीछा किए जाते समय 1 मई को मोकामा स्टेशन पर हुई और बोस समस्तीपुर ज़िले के वैनी में गिरफ़्तार किए गए।
परिणाम: बोस पर मुज़फ़्फ़रपुर में मुक़दमा चला और 11 अगस्त 1908 को, अठारह साल की उम्र में, वहीं फाँसी दी गई। इस मुक़दमे ने, और उसके बाद कलकत्ता में चले अलीपुर मुक़दमे ने, पूर्वी भारत के पहले क्रांतिकारी दशक को गढ़ा।
तिरहुत में नील की व्यवस्था19वीं सदी से 1917 तक
दरभंगा और मुज़फ़्फ़रपुर समेत पूरे तिरहुत के बाग़ान-मालिक किसानों को उनकी जोत के एक हिस्से पर नील उगाने के अनुबंधों में बाँधे रखते थे। यह व्यवस्था व्यापारिक रूप से पहले ही टूट रही थी, जब 1917 में इस क्षेत्र के ठीक पश्चिम में, चंपारण में, गांधी की जाँच शुरू हुई।
परिणाम: 1918 के चंपारण कृषि अधिनियम ने अनिवार्यता वाला हिस्सा ख़त्म कर दिया; जाँच चलाने वाले कई बिहारी वकील मिथिला के थे।
गढ़पुरा का नमक सत्याग्रह1930
क्षेत्र की प्रमुख सविनय अवज्ञा कार्रवाई, आज के बेगूसराय ज़िले के गढ़पुरा में, जहाँ स्वयंसेवकों ने क़ानून की अवहेलना करके नमक बनाया और उन्हें पीटा तथा गिरफ़्तार किया गया।
परिणाम: श्री कृष्ण सिंह, जो गिरफ़्तारियों के दौरान घायल हुए, छह महीने क़ैद रहे और फिर व्यापक सविनय अवज्ञा अभियान के दौरान दोबारा।
तिरहुत में भारत छोड़ोअगस्त 1942
9 अगस्त की गिरफ़्तारियों के बाद मुज़फ़्फ़रपुर, दरभंगा और कोसी के ज़िलों में भीड़ ने रेल तथा तार की लाइनें काटीं और थानों तथा डाकघरों पर क़ब्ज़ा कर लिया। 16 अगस्त को मीनापुर में एक थाना क़ब्ज़े में लिया गया और उसका थानेदार मारा गया।
परिणाम: साल के अंत तक आंदोलन दबा दिया गया। जुब्बा सहनी ने मीनापुर की कार्रवाई की ज़िम्मेदारी ली, उन पर एक विशेष अदालत में मुक़दमा चला और 11 मार्च 1944 को भागलपुर केंद्रीय कारागार में फाँसी दी गई।