कोचीन एक रियासत थी, कभी ब्रिटिश भूभाग नहीं, और इसी ने सब कुछ तय किया। यहाँ न कोई कलेक्टर था जिसे ललकारा जाता और न कोई भू-राजस्व बंदोबस्त जिसका विरोध किया जाता, इसलिए उपनिवेश-विरोधी राजनीति देर से आई और उसने दो रूप लिए: एक, राज्य के भीतर उत्तरदायी शासन की माँग, जो 1941 से कोचीन राज्य प्रजा मंडलम के ज़रिए संगठित हुई; और दूसरा, पहुँच का कहीं पुराना और कहीं बड़ा आंदोलन — कौन किस सड़क पर चल सकता है, किस मंदिर में जा सकता है, किसकी पंगत में खा सकता है और किस स्कूल में बैठ सकता है। इस क्षेत्र के भूगोल के भीतर लड़ा गया सबसे बड़ा अकेला अभियान 1931–32 का गुरुवायूर सत्याग्रह था, और यह दर्ज करने लायक़ है कि गुरुवायूर उस समय कोचीन राज्य में नहीं, बल्कि ब्रिटिश मलाबार ज़िले के पोन्नानी तालुक़ में पड़ता था: मंदिर इस क्षेत्र के भूगोल के भीतर है और इसकी राजनीति के बाहर।
चेराई का मिश्र-भोजनम1917
सहोदरन अय्यप्पन द्वारा चेराई में आयोजित एक सार्वजनिक सह-भोज, जिसमें अलग-अलग जातियों के लोगों ने खुले में साथ बैठकर खाया। यह कृत्य जान-बूझकर सहभोज के नियम पर बहस के रूप में नहीं, बल्कि उसके उल्लंघन के रूप में मंचित किया गया था, और इसकी क़ीमत आयोजकों को अपने ही समुदाय में वर्षों तक अपनी हैसियत गँवाकर चुकानी पड़ी।
परिणाम: सह-भोज इस तट पर सुधार आंदोलन का बार-बार इस्तेमाल होने वाला हथियार बन गया, और अय्यप्पन के अख़बार 'सहोदरन' ने दो दशक तक यह तर्क आगे बढ़ाया।
गुरुवायूर सत्याग्रह1931–1932
गुरुवायूर मंदिर को सभी हिंदुओं के लिए खोलने का अभियान, जिसका नेतृत्व के. केलप्पन ने किया, ए. के. गोपालन स्वयंसेवक-प्रमुख थे और पी. कृष्ण पिल्लै स्वयंसेवकों में थे। 1932 में पोन्नानी तालुक़ में हुए एक मतदान में लगभग 77 प्रतिशत लोग मंदिर-प्रवेश के पक्ष में दर्ज हुए। केलप्पन और मन्नत्तु पद्मनाभन ने 22 सितंबर 1932 को अनशन शुरू किया और 2 अक्टूबर को गांधी के अनुरोध पर उसे वापस ले लिया।
परिणाम: अभियान के दौरान मंदिर नहीं खुला; प्रवेश बाद में मद्रास प्रेसिडेंसी के क़ानून के तहत मिला। इस सत्याग्रह ने स्वयंसेवक जत्थे को इस तट पर राजनीतिक कार्रवाई का मानक रूप बना दिया।
कोचीन राज्य प्रजा मंडलम1941–1947
कोचीन राज्य के भीतर उत्तरदायी शासन की एक संगठित माँग — एक निर्वाचित विधानमंडल जिसके प्रति मंत्री जवाबदेह हों — जो सार्वजनिक सभाओं, अख़बारी अभियान और भारत छोड़ो के दौरान सविनय अवज्ञा के ज़रिए उठाई गई। इसके नेताओं को अंग्रेज़ों ने नहीं, राज्य ने जेल में डाला।
परिणाम: 1940 के दशक में कोचीन विधानमंडल का क्रमशः विस्तार हुआ, और दशक ख़त्म होने से पहले निर्वाचित सदस्यों में से एक मंत्रिमंडल बना।